दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के एक वर्षीय स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में लागू की गई नई प्रवेश प्राथमिकता प्रणाली को चुनौती देने वाली याचिका पर विश्वविद्यालय की शिकायत निवारण समिति को 3 दिनों के भीतर फैसला लेने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति जसमीत सिंह की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय की शिकायत निवारण समिति याचिका में उठाए गए मुद्दे पर विचार करे और स्पष्ट आदेश पारित करे। अदालत ने समिति को मामले पर जल्द निर्णय लेने की समयसीमा भी तय कर दी है। उसे तीन दिनों के भीतर इस संबंध में अपना निर्णय देना होगा।
छात्र ने दाखिला देने की मांग की
यह याचिका छात्र शिवा सिंह ने दायर की है। छात्र की ओर से अधिवक्ता पाञ्चजन्य बत्रा सिंह ने अदालत के समक्ष दलील रखते हुए DU की ओर से शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए अपनाई गई प्रवेश प्राथमिकता प्रणाली को रद्द करने की मांग की। याचिका में छात्र को मेरिट के आधार पर एमए पॉलिटिकल साइंस के एक वर्षीय पाठ्यक्रम में दाखिला देने का निर्देश देने की भी मांग की गई है।
बीए प्रोग्राम में पॉलिटिकल साइंस को चुना मेजर
याचिकाकर्ता के मुताबिक, उसने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत बीए प्रोग्राम में चौथे वर्ष के दौरान इकोनॉमिक्स और पॉलिटिकल साइंस विषयों का अध्ययन किया और पॉलिटिकल साइंस को अपना मेजर विषय चुना था। छात्र का कहना है कि उसने इसी आधार पर यह समझा था कि बीए प्रोग्राम पूरा करने के बाद वह DU के एक वर्षीय एमए पॉलिटिकल साइंस पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए पात्र होगा।
नई प्रवेश प्राथमिकता प्रणाली पर आपत्ति
याचिका में छात्र ने DU की नई प्रवेश प्राथमिकता प्रणाली पर सवाल उठाए हैं। उसका दावा है कि नई व्यवस्था के कारण उसकी एक वर्षीय एमए पॉलिटिकल साइंस में प्रवेश की संभावना प्रभावित हुई है। मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय की शिकायत निवारण समिति को पहले इस मुद्दे पर विचार कर निर्णय लेने का निर्देश दिया। याचिका छात्र शिवा सिंह ने दायर की है। उसकी ओर से अधिवक्ता पाञ्चजन्य बत्रा सिंह ने अदालत से शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए DU द्वारा अपनाई गई प्रवेश प्राथमिकता व्यवस्था को रद्द करने की मांग की है। याचिका में छात्र को मेरिट के आधार पर एमए पॉलिटिकल साइंस के एक वर्षीय पाठ्यक्रम में दाखिला देने का निर्देश देने की भी मांग की गई है।
4 जुलाई को जारी हुआ था सूचना बुलेटिन
याचिका के मुताबिक, 4 जुलाई 2026 को DU ने एक वर्षीय स्नातकोत्तर कार्यक्रमों के लिए सूचना बुलेटिन जारी किया था। इसमें एक नई प्राथमिकता व्यवस्था लागू की गई। इसके तहत संबंधित विषय में ऑनर्स डिग्री करने वाले छात्रों को उस विषय को मेजर के रूप में पढ़ने वाले बहुविषयक कार्यक्रम के छात्रों पर प्राथमिकता देने का प्रावधान किया गया। याचिकाकर्ता का आरोप है कि इस प्राथमिकता व्यवस्था के चलते उससे कम अंक प्राप्त करने वाले कुछ छात्रों को भी एमए पॉलिटिकल साइंस में प्रवेश मिल गया। याचिका में कहा गया है कि यह व्यवस्था उस समय लागू की गई, जब छात्र चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम के चौथे वर्ष की पढ़ाई पूरी करने के अंतिम चरण में था।
छात्रों के दो साल बर्बाद होने की आशंका
याचिकाकर्ता का कहना है कि नई व्यवस्था लागू होने से कई छात्रों को समय रहते न तो दो वर्षीय स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में दाखिला मिल सका और न ही वे एक वर्षीय PG कार्यक्रम में प्रवेश ले पाए। याचिका में दावा किया गया है कि ऐसी स्थिति में संबंधित छात्रों की पढ़ाई का समय प्रभावित हो सकता है और उनके दो वर्ष तक बर्बाद होने की संभावना है। याचिकाकर्ता के मुताबिक, उसने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत बीए प्रोग्राम में इकोनॉमिक्स और पॉलिटिकल साइंस का अध्ययन किया और चौथे वर्ष में पॉलिटिकल साइंस को अपना मेजर विषय चुना था। उसका कहना है कि इसी आधार पर उसे उम्मीद थी कि स्नातक पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद वह DU के एक वर्षीय एमए पॉलिटिकल साइंस कार्यक्रम में प्रवेश ले सकेगा।
प्राइवेट विश्वविद्यालयों की फीस को लेकर भी चिंता
याचिकाकर्ता के मुताबिक, उसने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत बीए प्रोग्राम में इकोनॉमिक्स और पॉलिटिकल साइंस विषय चुने थे और चौथे वर्ष में पॉलिटिकल साइंस को मेजर विषय के रूप में पढ़ा। उसकी समझ थी कि चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद वह DU के एक वर्षीय एमए पॉलिटिकल साइंस कार्यक्रम में प्रवेश ले सकेगा। याचिका में यह भी कहा गया कि प्राइवेट विश्वविद्यालयों की फीस अधिक होने के कारण बड़ी संख्या में छात्र आगे की पढ़ाई को लेकर चिंतित हैं। याचिकाकर्ता ने नई प्रवेश प्राथमिकता व्यवस्था को मनमाना और स्थापित कानूनी सिद्धांतों के विपरीत बताया है।
शिकायत निवारण समिति में है विवादों के समाधान का प्रावधान
सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि DU के सूचना बुलेटिन में ऐसे विवादों के निपटारे के लिए शिकायत निवारण समिति का प्रावधान किया गया है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी किए बिना याचिकाकर्ता को पहले विश्वविद्यालय की शिकायत निवारण व्यवस्था का रुख करने का निर्देश दिया। अदालत ने शिकायत निवारण समिति को याचिका में उठाए गए मुद्दों पर विचार कर तीन दिनों के भीतर स्पष्ट निर्णय लेने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने याचिका का निस्तारण कर दिया।
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