Dharm Desk – पूजा-पाठ और आध्यात्मिक साधना के लिए सुबह का समय सबसे अच्छा माना जाता है। यही कारण है कि बहुत से लोग नहाने के बाद सुबह ईश्वर की आराधना करते हैं। हालांकि आज कल की भागदौड़ भरी जिंदगी में हर मनुष्य के लिए सुबह पूजा करना संभव नहीं हो पाता। ऐसे में कई लोग दोपहर में नहाने के बाद पूजा करते हैं। इसे लेकर बहुत बार एक सवाल उठता है कि क्या दोपहर में पूजा करना सही है?

धार्मिक परंपराओं में दोपहर के समय नई और विशेष पूजा शुरू करने से बचने की सलाह दी गई है। ऐसा मानते है कि दोपहर 12 बजे से शाम 4 बजे तक का समय देवताओं के आराम का समय होता है। इसी वजह से कई मंदिरों में इस समय विशेष पूजा या दर्शन की व्यवस्था में बदलाव देखने को मिलता है। हालांकि इसका यह आशय नहीं है कि दोपहर में ईश्वर का स्मरण या सामान्य पूजा नहीं की जा सकती। भक्ति के लिए समय से ज्यादा श्रद्धा और भाव को महत्व दिया जाता है। अगर किसी कारण से सुबह पूजा नहीं हो पाती है तो मनुष्य अपनी सुविधा और परंपरा के अनुसार दूसरे समय में भी ईश्वर की आराधना कर सकता है। अगर कोई पूजा सुबह शुभ समय में शुरू हुई है और उसका अनुष्ठान दोपहर तक चलता है तो उसे बीच में रोकने की जरूरत नहीं होती। यज्ञ हवन और अन्य धार्मिक कार्यक्रमों को विधि-विधान के साथ पूरा किया जाता है । वहीं जिन पूजाओं में विशेष मुहूर्त का महत्व होता है उन्हें यत समय के अनुसार करना पूरा शुभ माना जाता है।
सावन में शिवलिंग पूजा के नियम
- सावन माह भगवान शंकर की उपासना के लिए विशेष महत्व रखता है। इस दौरान शिवलिंग पर जलाभिषेक रुद्राभिषेक और मंत्र जाप करने की परंपरा है।
- श्रद्धालु सुबह स्नान करने के बाद साफ कपड़े पहनकर शिवलिंग पर जल गंगाजल दूध, बेलपत्र, धतूरा और फूल चढ़ाते हैं। शिव पूजा में बेलपत्र का बहुत महत्व बताया गया है। तीन पत्तियों वाले बेलपत्र को भगवान शंकर को चढ़ाना शुभ माना जाता है।
- सानव के सोमवार को भोलेनाथ की आराधना के लिए खास दिन माना जाता है। इस दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपवास रखते हैं, जल चढ़ाते हैं और भगवान शंकर का आशीर्वाद लेते हैं।
- शिवलिंग पर जल चढ़ाते समय साफ-सफाई और पूजा की शुद्धता का ध्यान रखना बहुत जरूरी होता है। कई श्रद्धालु ओम नमः शिवाय मंत्र का जाप करते हुए पूजा करते हैं। हालांकि पूजा की विधि और नियम अलग-अलग स्थानों और परंपराओं के अनुसार अलग हो सकते हैं।
- पूजा के समय का महत्व अपनी जगह है लेकिन भगवान की आराधना में श्रद्धा और भाव को सबसे अधिक स्थान दिया गया है। परिस्थितियों के अनुसार नियमों का पालन करते हुए ईश्वर का स्मरण और पूजा की जा सकती है।


