अमित पांडेय, खैरागढ़। एडवर्ड चिल्ड्रन पार्क, छोटे झाड़ का जंगल, घास भूमि और कथित अवैध प्लाटिंग से जुड़े बहुचर्चित भूमि विवाद में अब ऐसा मोड़ आ गया है, जिसने पूरे मामले को केवल राजस्व या प्लाटिंग विवाद से आगे बढ़ाकर इतिहास और स्वामित्व के मूल प्रश्न तक पहुंचा दिया है। लगातार सामने आ रहे दस्तावेजों और लल्लूराम डॉट कॉम में प्रकाशित खबरों के बाद संभाग आयुक्त कार्यालय ने मामले की जानकारी तलब की है, जिसके बाद कलेक्टर ने सात सदस्यीय उच्चस्तरीय जांच समिति गठित कर दी है, लेकिन जांच शुरू होने से पहले ही एक नया सवाल पूरे मामले के केंद्र में आ गया है।

यदि एडवर्ड पार्क वास्तव में राजपरिवार की निजी संपत्ति था तो वर्ष 1948 में रियासत विलय के समय तैयार की गई निजी संपत्तियों की आधिकारिक सूची में उसका नाम क्यों नहीं है? ये पूरा विवाद नगर खैरागढ़ के खसरा नंबर 167, 169 और 170 तथा नजूल (शासकीय अभिलेख में दर्ज भूमि) प्लॉट नंबर 114 और 115 से जुड़ा है। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार इन भूमि खंडों का अलग-अलग रिकॉर्ड में अलग-अलग स्वरूप दिखाई देता है।

राजस्व अभिलेखों में खसरा नंबर 167, 169 और 170 को सड़क, रास्ता, घास भूमि और छोटे झाड़ का जंगल बताया गया है। वहीं नजूल मेंटेनेंस खसरे में प्लॉट नंबर 114 को “एडवर्ड चिल्ड्रन पार्क” और प्लॉट नंबर 115 को “बाड़ी एडवर्ड चिल्ड्रन पार्क” के रूप में दर्ज बताया गया है। इसके बावजूद बाद के वर्षों में इसी भूमि पर निजी स्वामित्व का दावा सामने आया और फिर कथित रूप से भूमि का विभाजन कर प्लाटिंग की गई।

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1974 की रजिस्ट्री से शुरू हुई नई बहस अब इन्वेंटरी लिस्ट पर आई

मामले में वर्ष 1974 की एक पंजीकृत रजिस्ट्री सामने आई है। दस्तावेज के अनुसार प्लॉट नंबर 114 और 115 अवयस्क स्मृति सिंह के नाम हस्तांतरित किए गए थे। रजिस्ट्री में तत्कालीन राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह विक्रेता के रूप में दर्ज हैं। उनकी ओर से रविंद्र बहादुर सिंह ने अधिकृत प्रतिनिधि (आम मुख्तियार/पावर ऑफ अटॉर्नी धारक) के रूप में दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे। उस समय भूमि का विक्रय मूल्य मात्र 3 हजार रुपये दर्शाया गया था। यही रजिस्ट्री आज भूमि के निजी स्वामित्व के दावे का प्रमुख आधार मानी जा रही है।

पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज अब खैरागढ़ रियासत के भारत संघ में विलय के समय तैयार की गई “रूलर्स प्राइवेट प्रॉपर्टी इन्वेंटरी” (शासक की निजी संपत्तियों की सूची) बन गई है। इस सूची में राजपरिवार की निजी संपत्तियों का विस्तृत विवरण दर्ज है। कमल विलास पैलेस, लाल निवास, लाल बाग डोंगरगढ़ सहित कई भवनों, भूखंडों और उद्यानों का उल्लेख मिलता है। उद्यानों की श्रेणी में महाराज बाग, रानी बाग और रामानुज बाग जैसे नाम स्पष्ट रूप से दर्ज हैं, लेकिन एडवर्ड पार्क का नाम इस सूची में दिखाई नहीं देता। यहीं से पूरा विवाद नए स्तर पर पहुंच गया है, क्योंकि यदि एडवर्ड पार्क वास्तव में निजी संपत्ति था तो उसका उल्लेख उस सूची में होना चाहिए था, जिसे रियासत विलय के समय निजी संपत्तियों का आधार दस्तावेज माना गया था।

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संयुक्त जांच प्रतिवेदन में लगभग 85,627 वर्गफीट भूमि के विभिन्न लोगों को विक्रय किए जाने का उल्लेख है। जानकारी के अनुसार भूमि को 22 हिस्सों में विभाजित कर प्लाटिंग की गई। वर्तमान बाजार मूल्य के आधार पर इस भूमि की कीमत 40 करोड़ रुपये से अधिक आंकी जा रही है। यही वजह है कि यह मामला अब केवल एक रजिस्ट्री या प्लाटिंग का नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये मूल्य की भूमि के मूल स्वामित्व का प्रश्न बन गया है।

विधानसभा से लेकर संभाग आयुक्त कार्यालय तक पहुंचा मामला

वर्ष 2020 में तत्कालीन विधायक स्वर्गीय देवव्रत सिंह ने विधानसभा में खैरागढ़ क्षेत्र में कथित अवैध प्लाटिंग का मुद्दा उठाया था। इसके बाद प्रशासनिक स्तर पर जांच भी हुई और कुछ मामलों में रजिस्ट्रियों पर रोक लगाने जैसी कार्रवाई की गई। अब लगातार प्रकाशित खबरों और सामने आए दस्तावेजों के बाद संभाग आयुक्त कार्यालय ने पूरे मामले की जानकारी मांगी है। इसके बाद कलेक्टर ने अपर कलेक्टर की अध्यक्षता में सात सदस्यीय जांच समिति गठित कर दी है।

जांच में खुल सकते हैं कई राज

जांच समिति अब 1948 की निजी संपत्ति सूची, रियासत विलय दस्तावेज, मूल राजस्व रिकॉर्ड, नजूल अभिलेख, मेंटेनेंस खसरा, 1974 की रजिस्ट्री, नामांतरण आदेश, सीमांकन प्रतिवेदन और नगर एवं ग्राम निवेश विभाग के रिकॉर्ड का संयुक्त परीक्षण करेगी। यही जांच तय करेगी कि एडवर्ड पार्क की मूल स्थिति क्या थी, भूमि का स्वामित्व किस आधार पर स्थापित हुआ और क्या सार्वजनिक उपयोग या शासकीय प्रकृति की भूमि बाद में निजी स्वामित्व के रिकॉर्ड तक पहुंच गई।

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अब सबसे बड़ा सवाल

पहले सवाल था कि 22 प्लॉट कैसे बने, फिर सवाल उठा कि कथित अवैध प्लाटिंग कैसे हुई। उसके बाद सवाल उठा कि एडवर्ड चिल्ड्रन पार्क की भूमि बिक्री के लिए कैसे उपलब्ध हुई, लेकिन अब पूरा मामला एक ही प्रश्न पर आकर टिक गया है कि जब 1948 की निजी संपत्ति सूची में महाराज बाग, रानी बाग और रामानुज बाग जैसी संपत्तियां दर्ज हैं, लेकिन एडवर्ड पार्क का नाम नहीं है तो आखिर उसके निजी स्वामित्व का मूल आधार क्या है? अब इस सवाल का जवाब केवल दस्तावेज, रिकॉर्ड और प्रशासनिक जांच ही दे सकती है, क्योंकि इसी जवाब पर खैरागढ़ की करोड़ों रुपये मूल्य की विवादित भूमि का पूरा इतिहास टिका हुआ है।

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