हेमंत शर्मा, इंदौर। युवाओं में धैर्य की कमी, सोशल मीडिया पर दिखावे वाली भक्ति, राजनीति में युवाओं की सीमित भागीदारी और जीवन में असफलता से टूटने की प्रवृत्ति… इन तमाम मुद्दों पर कथावाचक पंडित इंद्रेश उपाध्याय ने देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में आयोजित जेनजी चर्चा के दौरान अपनी बात रखी। उन्होंने युवाओं को केवल उपदेश नहीं दिया, बल्कि अपनी दिनचर्या के उदाहरणों से यह समझाने की कोशिश की कि व्यस्तता, आलोचना और विपरीत परिस्थितियों के बीच खुद को स्थिर रखना कितना मुश्किल होता है। उनकी चर्चा का सबसे चर्चित संदेश रहा— “Gen-Z यूजलेस नहीं है, बल्कि यूज्ड-लेस है।” यानी युवा बेकार नहीं हैं, बल्कि उनका उपयोग कम किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि देश की राजनीतिक और संवैधानिक व्यवस्थाओं में युवाओं को अधिक अवसर मिलने चाहिए। साथ ही उन्होंने धैर्य विकसित करने के लिए भगवान के नाम का आश्रय लेने, कम बोलने, चुगली से बचने और दूसरों के हित के बारे में सोचने की अपील की।

30 दिन भगवान का नाम लेकर देखिए, फिर खुद अनुभव कीजिए: इंद्रेश उपाध्याय

पंडित इंद्रेश उपाध्याय ने अपनी चर्चा में बार-बार धैर्य यानी पेशेंस पर जोर दिया। उनका कहना था कि भक्ति का पहला गुण सहनशीलता है। उन्होंने युवाओं से कहा कि वे 30 दिन तक किसी एक नाम— जैसे ‘राम-राम’ या ‘ॐ नमः शिवाय’— का नियमित जप करके देखें।उन्होंने इसके साथ आचार-विचार, खानपान और व्यवहार में शुद्धता बनाए रखने की भी बात कही। उनके मुताबिक, लगातार नाम जपने से व्यक्ति की प्रतिक्रिया देने की आदत, क्रोध और अधैर्य में बदलाव आ सकता है।उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस परिस्थिति में पहले व्यक्ति तुरंत क्रोधित हो जाता था, समय के साथ उसी परिस्थिति में वह खुद को संभालना सीख सकता है। उनके शब्दों में, हर बात पर परेशान होने के बजाय कुछ चीजों को जाने देना भी जीवन का बड़ा गुण है।

अपनी दिनचर्या बताकर समझाया, व्यास मंच पर बैठना आसान नहीं

कथावाचक ने अपनी व्यस्त दिनचर्या का उदाहरण देते हुए बताया कि एक कथा के बाद गुजरात के कच्छ जाने के दौरान उड़ान को भुज के बजाय राजकोट में उतारना पड़ा। वहां से सड़क मार्ग से यात्रा कर वे सुबह करीब 3:30 बजे कच्छ पहुंचे। कुछ घंटों बाद कार्यक्रमों में शामिल हुए, फिर विमान से इंदौर लौटे और घर जाकर तैयार होने के बाद सीधे कथा मंच पर पहुंचे।उन्होंने बताया कि कथा, यात्राओं, धार्मिक आयोजनों और लोगों से मिलने के बीच आराम और भोजन का समय भी कई बार प्रभावित होता है। इसके बावजूद मंच पर हजारों लोगों के सामने स्थिर रहना और अलग-अलग तरह की अपेक्षाओं को संभालना पड़ता है।उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति की अपनी परेशानियां और परिस्थितियां होती हैं। इसलिए किसी को बाहर से देखकर उसके जीवन को आसान नहीं मानना चाहिए। धैर्य बनाए रखने के लिए व्यक्ति को अपने भीतर स्थिरता विकसित करनी पड़ती है।

Gen-Z को लेकर बोले— युवा बेकार नहीं, उन्हें अवसर कम मिले

पंडित इंद्रेश उपाध्याय ने युवाओं की सामाजिक और राजनीतिक भागीदारी पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि युवा अपनी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा संघर्ष और अवसर पाने की कोशिश में लगा देते हैं, जबकि राजनीति और संवैधानिक संस्थाओं में उन्हें अधिक जगह मिलनी चाहिए।उन्होंने ‘यूज्ड-लेस’ शब्द का इस्तेमाल करते हुए कहा कि युवाओं की क्षमता का पर्याप्त उपयोग नहीं हो रहा है। इसी तरह ‘केयर-लेस’ के बजाय ‘केयर्ड-लेस’ का भाव समझाते हुए उन्होंने कहा कि युवाओं की जरूरतों और उनके भविष्य पर पर्याप्त ध्यान देने की आवश्यकता है।उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि युवाओं के आंदोलनों या विरोध के हर तरीके का समर्थन करना उनका उद्देश्य नहीं है। उनकी बात का केंद्र यह था कि युवाओं को केवल आलोचना का विषय बनाने के बजाय उन्हें अवसर और जिम्मेदारी भी दी जानी चाहिए।

आज के युवाओं में धैर्य की कमी क्यों?

कथावाचक ने कहा कि आज कई युवा अपनी अपेक्षाओं के मुताबिक परिणाम नहीं मिलने पर जल्दी निराश हो जाते हैं। उनके अनुसार, सफलता पाने वाले लोगों के जीवन में भी कठिन परिस्थितियां आती हैं, लेकिन वे अपने लक्ष्य और कर्म से पीछे नहीं हटते।उन्होंने विराट कोहली, सचिन तेंदुलकर और महेंद्र सिंह धोनी जैसे खिलाड़ियों के उदाहरणों का उल्लेख करते हुए कहा कि लोगों की जीवनियां इसलिए प्रेरणा देती हैं, क्योंकि उनमें कठिन परिस्थितियों के बावजूद आगे बढ़ते रहने की कहानियां होती हैं।उन्होंने यह भी कहा कि संसार में हर व्यक्ति को लगता है कि उसके दुख सबसे बड़े हैं, जबकि हर किसी के जीवन में किसी न किसी तरह का संघर्ष मौजूद है। इसलिए दूसरों की परिस्थितियों को समझना और अपनी परेशानी के बीच भी संतुलन बनाए रखना जरूरी है।

चुगली, गॉसिप और हर बात में बोलने की आदत छोड़ने की सलाह

पंडित इंद्रेश उपाध्याय ने युवाओं को व्यवहार में बदलाव लाने की सलाह देते हुए कहा कि नियमित नाम जप से व्यक्ति का मन अनावश्यक बातचीत, चुगली और दूसरों की बुराई में कम लग सकता है।उन्होंने समझाया कि यदि किसी व्यक्ति के बारे में कोई नकारात्मक बात सुनने को मिले, तो उसे आगे बढ़ाकर दूसरे तक पहुंचाना जरूरी नहीं है। कई बार मौन रहना और किसी की मानसिक शांति खराब करने से बचना बेहतर होता है।उन्होंने सहनशीलता, करुणा, शांति और सबके हित की भावना को अच्छे व्यक्तित्व के महत्वपूर्ण गुण बताया। उनके मुताबिक, किसी की सफलता देखकर ईर्ष्या करने के बजाय सबके आगे बढ़ने की कामना करना भी भक्ति का एक महत्वपूर्ण पक्ष है।

सोशल मीडिया पर भक्ति का प्रदर्शन या भीतर का भाव?

धार्मिक स्थलों पर युवाओं के सोशल मीडिया व्यवहार पर भी उन्होंने टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि महाकाल, वृंदावन या दूसरे धार्मिक स्थलों पर जाना और वहां के अनुभव साझा करना अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन केवल ट्रेंडिंग ऑडियो, वीडियो और पोस्ट के लिए ही यात्रा करना भक्ति के निजी भाव को कमजोर कर सकता है।
उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि धार्मिक स्थलों पर पहुंचकर वहां के आध्यात्मिक अनुभव को महसूस करें। सोशल मीडिया पर पोस्ट डालने के साथ-साथ अपने भीतर की श्रद्धा और व्यक्तिगत भाव को भी महत्व दें।

पश्चिमी संस्कृति और भारतीय युवाओं के धैर्य पर टिप्पणी

पंडित इंद्रेश उपाध्याय ने विदेश में वाहन चलाने के अपने अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा कि अलग-अलग देशों में व्यवहार और नियमों को लेकर लोगों की अपेक्षाएं अलग होती हैं। न्यूजीलैंड में वाहन चलाते समय इंडिकेटर नहीं देने पर पीछे चल रही गाड़ियों के हॉर्न बजाने का उदाहरण देते हुए उन्होंने धैर्य और प्रतिक्रिया देने के तरीके पर बात की।उन्होंने भारतीय युवाओं में बढ़ती अधीरता को लेकर चिंता जताई और कहा कि किसी की आलोचना सुनने पर तुरंत नाराज होने के बजाय यह भी सोचना चाहिए कि सामने वाला किसी कमी की ओर ध्यान दिला रहा हो सकता है।उन्होंने अपने पिता, मां, बहनों और साथ काम करने वाले लोगों से मिलने वाले सुझावों का उदाहरण भी दिया। उनका कहना था कि आलोचना को सुनने और अपनी गलतियों को सुधारने की क्षमता व्यक्ति की प्रगति में मदद करती है।

पैंट-शर्ट, पारंपरिक पहनावा और संस्कृति पर भी रखी बात

चर्चा के दौरान उन्होंने भारतीय पारंपरिक पहनावे और सांस्कृतिक परंपराओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने धोती, कुर्ता और अंगवस्त्र जैसे परिधानों की बात करते हुए कहा कि अपनी परंपराओं को समझना और उनके पीछे के विचारों पर ध्यान देना जरूरी है।उन्होंने युवाओं से अपनी संस्कृति को केवल बाहरी तौर पर अपनाने के बजाय उसके अर्थ और मूल्यों को समझने की अपील की। इस दौरान उन्होंने भारतीय और पश्चिमी जीवनशैली के अंतर पर भी अपने विचार रखे।

अहिल्याबाई होल्कर का उदाहरण देकर बताया, जीवन का उद्देश्य क्या हो

देवी अहिल्याबाई होल्कर का उल्लेख करते हुए पंडित इंद्रेश उपाध्याय ने कहा कि जीवन का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत सफलता या भौतिक सुविधाएं हासिल करना नहीं होना चाहिए। ऐसा काम करना चाहिए, जिससे समाज और आने वाली पीढ़ियों को लाभ मिले।उन्होंने अहिल्याबाई होल्कर के सार्वजनिक और धार्मिक कार्यों का उदाहरण देते हुए कहा कि किसी व्यक्ति की पहचान उसके योगदान से बनती है। उन्होंने युवाओं को अपने लक्ष्य तय करते समय समाज के हित और दूसरों के उत्थान को भी ध्यान में रखने की सलाह दी।

कथा के संदेश का केंद्र— धैर्य, भक्ति और युवाओं को अवसर

देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में हुई इस चर्चा में पंडित इंद्रेश उपाध्याय ने धार्मिक आस्था के साथ-साथ युवाओं के व्यवहार, मानसिक मजबूती, सामाजिक जिम्मेदारी और राजनीतिक भागीदारी जैसे विषयों को भी जोड़ा। उनका संदेश था कि कठिन परिस्थितियों में टूटने के बजाय आगे बढ़ते रहना, अपनी गलतियों को स्वीकार करना और दूसरों के प्रति करुणा रखना जरूरी है।उनकी चर्चा में दो बातें खास तौर पर उभरकर सामने आईं— युवाओं की क्षमता को पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए और जीवन में धैर्य विकसित करने के लिए व्यक्ति को अपने व्यवहार तथा विचारों पर लगातार काम करना चाहिए।

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