हेमंत शर्मा, इंदौर। इंदौर नगर निगम एक बार फिर विवादों में है। इस बार मामला 1 जुलाई 2026 को जारी 535 विनियमित कर्मचारियों के स्थायीकरण आदेश का है। आदेश जारी होते ही सूची में ऐसी गंभीर गड़बड़ियों के दावे सामने आए हैं, जिन्होंने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल अनुक्रमांक-312 पर दर्ज अतुल बाजपेयी के नाम को लेकर उठ रहा है। 

खबर के मुताबिक, अतुल बाजपेयी को विधानसभा प्रश्न में नगरी प्रशासन मंत्री को गलत जानकारी भेजने के आरोप में पहले ही सेवा से बर्खास्त किया जा चुका था, लेकिन इसके बावजूद उनका नाम स्थायीकरण सूची में शामिल कर दिया गया। यहीं नहीं, अनुक्रमांक-502 पर राजकुमार सालवी का नाम भी सूची में दर्ज बताया गया है। 

दावा है कि राजकुमार सालवी को 150 करोड़ रुपये के कथित फर्जी बिल घोटाले में बर्खास्त किया गया था और वे इस मामले में जेल भी जा चुके हैं। इसके बावजूद उनका नाम भी स्थायी कर्मचारियों की सूची में शामिल कर दिया गया। सूची में अनुक्रमांक-503 पर अब्दुल शाहिद खान का नाम है, जो सेवानिवृत्त हो चुके हैं। वहीं अनुक्रमांक-509 पर अचल दुबे का नाम दर्ज है, जिनके बारे में खबर में मृतक होने का दावा किया गया है। 

इतना ही नहीं, अनुक्रमांक-534 पर सुमित देव का नाम भी है, जो रिटायर हो चुके बताए गए हैं। मामला सिर्फ नामों तक सीमित नहीं है। आरोप यह भी है कि कई कर्मचारियों को उनकी शैक्षणिक योग्यता और पात्रता के अनुरूप पद देने के बजाय चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में स्थायी कर दिया गया। जबकि इनमें कुछ कर्मचारी एलएलबी, एमकॉम और एमए जैसी उच्च शिक्षा प्राप्त हैं। 

नगर निगम को कुल 1391 कर्मचारियों में से 535 कर्मचारियों को स्थायी करना था, लेकिन अब सूची में सामने आई इन कथित गड़बड़ियों ने पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नगर निगम ने बिना रिकॉर्ड का सत्यापन किए स्थायीकरण आदेश जारी कर दिया? आखिर बर्खास्त, सेवानिवृत्त और मृत कर्मचारियों के नाम सूची तक कैसे पहुंच गए? अब निगाहें नगर निगम प्रशासन पर हैं कि वह इन दावों पर क्या सफाई देता है और जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई होती है।

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