दिल्ली में एक व्यक्ति को पत्नी के इलाज के बाद हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम (Health insurance claim) के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। अस्पताल के खर्च का पूरा भुगतान नहीं मिलने पर उन्होंने कंज्यूमर कमीशन का रुख किया, जहां से उन्हें राहत मिली। मामले के अनुसार, व्यक्ति की पत्नी का इलाज चल रहा था, लेकिन कुछ हफ्तों बाद उनका निधन हो गया। इलाज के दौरान हुए अस्पताल खर्च का भुगतान पाने के लिए उन्होंने हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी में दावा किया। हालांकि, कंपनी ने विभिन्न बीमा शर्तों और क्लॉज का हवाला देते हुए कुल खर्च का केवल करीब एक तिहाई हिस्सा ही वापस किया।
इसके बाद पीड़ित ने कंज्यूमर कमीशन में शिकायत दर्ज कराई। सुनवाई के दौरान कमीशन ने माना कि इंश्योरेंस कंपनी अपनी ओर से की गई कटौती को उचित साबित नहीं कर पाई। कमीशन ने नेशनल इंश्योरेंस कंपनी को निर्देश दिया कि वह बीमा राशि का बकाया भुगतान करने के साथ शिकायतकर्ता को मुआवजा और कानूनी खर्च भी दे।
फैमिली हेल्थ पॉलिसी ली थी
यह मामला प्रवाश मोहंती की शिकायत से जुड़ा है, जिन्होंने अपनी पत्नी के इलाज के खर्च की पूरी रकम नहीं मिलने पर कंज्यूमर कमीशन का दरवाजा खटखटाया था। मोहंती ने उपभोक्ता आयोग में याचिका दायर की थी, जिस पर अध्यक्ष सुखवीर सिंह मल्होत्रा और सदस्य रवि कुमार सुनवाई कर रहे थे। मामले के अनुसार, मोहंती ने वर्ष 2020 में अपनी पत्नी को खो दिया था। इसके बाद उन्हें हेल्थ इंश्योरेंस की राशि हासिल करने में परेशानी का सामना करना पड़ा। उनके पास अपने और पत्नी के लिए फैमिली हेल्थ पॉलिसी थी, जो 1 अप्रैल 2020 से मार्च 2021 तक प्रभावी थी। इस पॉलिसी के तहत दोनों के लिए 3 लाख रुपये का बीमा कवर उपलब्ध था। पत्नी के इलाज के दौरान हुए खर्च के भुगतान को लेकर बीमा कंपनी और शिकायतकर्ता के बीच विवाद हुआ, जिसके बाद मामला उपभोक्ता आयोग पहुंचा।
भुगतान के आदेश
आयोग ने अपने 1 जून के आदेश में नेशनल इंश्योरेंस कंपनी को निर्देश दिया कि वह शिकायतकर्ता प्रवाश मोहंती को 1,65,266 रुपये का भुगतान करे। इसके अलावा आयोग ने कंपनी को शिकायत दर्ज करने की तारीख से 9 % सालाना ब्याज की दर से 20,000 रुपये मुआवजा और 10,000 रुपये कानूनी खर्च के रूप में देने का भी आदेश दिया है। मामले की सुनवाई कंज्यूमर कमीशन के अध्यक्ष सुखवीर सिंह मल्होत्रा और सदस्य रवि कुमार की पीठ कर रही थी।
शिकायत में क्या बताया
हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम मामले में शिकायतकर्ता प्रवाश मोहंती ने कंज्यूमर कमीशन में अपनी शिकायत में इलाज से जुड़ी पूरी जानकारी दी थी। उन्होंने बताया कि उनके और उनकी पत्नी के लिए एक फैमिली हेल्थ पॉलिसी थी, जो 1 अप्रैल 2020 से मार्च 2021 तक प्रभावी थी। इस पॉलिसी के तहत 3 लाख रुपये का बीमा कवर उपलब्ध था। शिकायत के मुताबिक, उनकी पत्नी को अपने गृहनगर भुवनेश्वर जाना पड़ा, जहां वह बीमार पड़ गईं। इसके बाद 20 जून 2020 को उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। चार दिन इलाज के बाद उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई, लेकिन उनकी तबीयत में सुधार नहीं हुआ। इसके बाद दो दिन बाद उनकी हालत और बिगड़ने पर उन्हें दूसरे अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां वह 3 जुलाई 2020 तक इलाजरत रहीं। इलाज के दौरान हुए खर्च के भुगतान के लिए मोहंती ने हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी के समक्ष दावा पेश किया, लेकिन कंपनी ने पॉलिसी के विभिन्न प्रावधानों का हवाला देते हुए पूरी राशि का भुगतान नहीं किया।
दोनों अस्पतालों ने कुल 3.08 लाख का बिल बनाया
हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम मामले में शिकायतकर्ता प्रवाश मोहंती ने कंज्यूमर कमीशन में बताया कि उनकी पत्नी इलाज के बाद भी ठीक नहीं हो सकीं और 17 जुलाई 2020 को उनका निधन हो गया। शिकायत के अनुसार, पत्नी के इलाज के लिए दो अस्पतालों में कुल 3.08 लाख रुपये का बिल बना था। लेकिन हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी ने क्लेम के तौर पर केवल 91,158 रुपये का भुगतान किया। मोहंती का आरोप था कि उन्होंने कई बार कंपनी से संपर्क कर बाकी रकम की मांग की, लेकिन बीमा कंपनी ने शेष भुगतान नहीं किया। इसके बाद उन्होंने कंज्यूमर कमीशन का रुख किया और बीमा कंपनी पर सेवा में कमी का आरोप लगाया। शिकायतकर्ता ने मांग की कि कंपनी को बकाया राशि के रूप में 2.08 लाख रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया जाए। इसके अलावा उन्होंने मानसिक परेशानी और उत्पीड़न के लिए 2 लाख रुपये मुआवजा तथा कानूनी खर्च की भरपाई की भी मांग की।
इंश्योरेंस कंपनी का पक्ष
हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम मामले में नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड ने कंज्यूमर कमीशन के सामने अपनी दलीलें रखीं। कंपनी की ओर से पेश वकील शौमिक मजूमदार ने कहा कि शिकायत सुनवाई योग्य नहीं है और क्लेम के निपटारे में कंपनी की ओर से कोई कमी नहीं बरती गई। बीमा कंपनी ने तर्क दिया कि क्लेम का भुगतान पॉलिसी की शर्तों के अनुसार किया गया था। कंपनी के मुताबिक, पॉलिसी के तहत केवल 91,198 रुपये का भुगतान बनता था, जबकि बाकी राशि विभिन्न क्लॉज और प्रेफर्ड प्रोवाइडर नेटवर्क (PPN) की दरों के आधार पर काटी गई थी। कंपनी ने यह भी दलील दी कि शिकायतकर्ता की पत्नी को ऐसे अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जो नॉन-PPN अस्पताल था। बीमा कंपनी के अनुसार, संबंधित क्षेत्र में PPN अस्पताल उपलब्ध था, इसलिए पॉलिसी की शर्तों के तहत कटौती की गई।
Follow the LALLURAM.COM MP channel on WhatsApp
https://whatsapp.com/channel/0029Va6fzuULSmbeNxuA9j0m

