इंदर कुमार, जबलपुर। मध्य प्रदेश में शासकीय कर्मचारियों के प्रमोशन और नियुक्तियों के लिहाज से सबसे बड़े और संवेदनशील मामले यानी ‘प्रमोशन में आरक्षण’ (Reservation in Promotion) विवाद में एक नया मोड़ आ गया है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश (Acting Chief Justice) विवेक रूसिया ने इस प्रकरण की सुनवाई से खुद को पूरी तरह अलग कर लिया है।
अब इस मामले की सुनवाई के लिए एक नए सिरे से विशेष बेंच का गठन किया जाएगा, जो इस पूरे कानूनी विवाद को दोबारा सुनेगी। इसी के साथ हाई कोर्ट ने कर्मचारियों को किसी भी तरह की अंतरिम या अंतिम राहत देने से भी साफ इनकार कर दिया है।
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क्यों हटे एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया?
इस मामले में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया के खुद को अलग करने के पीछे एक बड़ा तकनीकी और नैतिक कारण है। दरअसल जज बनने से पहले जस्टिस विवेक रूसिया इस विवाद से जुड़े ‘आर.बी. राय’ वाले मूल प्रकरण में बतौर वकील पैरवी कर चुके हैं और कोर्ट रिकॉर्ड में उनका वकालतनामा आज भी मौजूद है। कानूनी सिद्धांतों और निष्पक्षता के नियम के अनुसार कोई भी जज उस मामले की सुनवाई नहीं कर सकता जिसमें वह खुद कभी वकील रहा हो। इसी के चलते उन्होंने इस केस को सुनने से गरिमापूर्वक इनकार कर दिया।
पूर्व चीफ जस्टिस के सुप्रीम कोर्ट जाने से बदली स्थिति
इस पूरे मामले में यह पेच तब फंसा जब हाई कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा पदोन्नत होकर सुप्रीम कोर्ट चले गए। इससे पहले 17 फरवरी को ही इस मामले की लंबी और विस्तृत सुनवाई पूरी हो चुकी थी लेकिन फैसला आने से पहले ही स्थितियां बदल गईं। अब पूर्व चीफ जस्टिस के जाने और कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के खुद को अलग करने के बाद इस मामले की नए सिरे से सुनवाई होना तय हुआ है।
‘अंतिम राहत’ से कोर्ट का इनकार, नियुक्तियों और प्रमोशन पर लगा ब्रेक
हाई कोर्ट ने इस मामले में किसी भी प्रकार की अंतिम या अंतरिम राहत देने से दो टूक मना कर दिया है। गौरतलब है कि साल 2022 में आरक्षण संबंधी नियम को निरस्त किए जाने के बाद से ही प्रदेश में नियमित पदोन्नतियां और नई नियुक्तियां पूरी तरह से ठप पड़ी हैं। मामला कोर्ट में पेंडिंग होने की वजह से हजारों शासकीय कर्मचारी प्रभावित हो रहे हैं, क्योंकि समय पर उनका प्रमोशन नहीं हो पा रहा है।
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प्रशासनिक कामकाज पर पड़ रहा है सीधा असर
‘प्रमोशन में आरक्षण’ का यह विवाद सिर्फ कर्मचारियों के हक तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर मध्य प्रदेश के प्रशासनिक ढांचे पर पड़ रहा है। कई विभागों में उच्च पद खाली पड़े हैं या प्रभार के भरोसे चल रहे हैं, जिससे रोजमर्रा का शासकीय और प्रशासनिक कामकाज बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। अब प्रदेश के लाखों कर्मचारियों और अधिकारियों की नजरें हाई कोर्ट द्वारा गठित होने वाली नई विशेष बेंच और उसके आने वाले फैसले पर टिकी है।
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