Dharm Desk – हर साल आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भगवान जगन्नाथ की पवित्र रथ यात्रा का शुभारंभ होता है. इस दौरान महाप्रभु जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ नगर भ्रमण के लिए निकलते हैं. इस साल यह ऐतिहासिक और विश्वप्रसिद्ध रथ यात्रा 16 जुलाई, गुरुवार को ओडिशा के पुरी धाम से शुरू होगी. यह यात्रा करीब एक सप्ताह तक चलती है. 24 जुलाई तक विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों के साथ सम्पन्न होती है. इस दिन भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा विलशा रथों में सवार होकर पुरी के श्री मंदिर से गुंडिचा मंदिर तक निकलते है. यह लगभग 3 किमी की यात्रा होती है. जिसमें लाखों श्रद्धालु शामिल होते है.

क्यों मनाई जाती है रथ यात्रा
पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान जगन्नाथ अपनी मौसी के घर यानी गुंडिचा मंदिर जाने के लिए इस यात्रा पर निकलते है. यह यात्रा भगवान के अपने भक्तों के बीच आने का प्रतीक मानी जाती है. साथ ही यह भी माना जाता है कि जो भक्त इस यात्रा के दौरान भगवान के दर्शन करता है. उसे विशेष पुण्य और मोक्ष की प्राप्ति होती है. रथ यात्रा को आत्मा की मुक्ति और भगवान तक पहुंचने के मार्ग का प्रतीक भी कहा गया है.
रथ की रस्सी खींचने से पहले जान लें ये नियम
रथ यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण परंपरा है रथ की रस्सी खींचना. जिसे अत्यंत पुण्यभीदायी माना जाता है. लेकिन इसके लिए कुछ नियमों का पालन जरूरी …
- रथ खींचने से पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहने.
- मन में श्रद्धा और भगवान के प्रति पूर्ण आस्था रखें.
- धक्का-मुक्की या जल्दबाजी से बचें, अनुशासन बनाए रखें.
- नशे या अशुद्ध अवस्था में रथ को स्पर्श करना वर्जित होता है.
- भगवान का नाम लेते हुए और भजन-कीर्तन के साथ रथ खींचना शुभ माना है.
- चमड़े की बेल्ट, पर्स, जूते या चप्पल जैसी अशुद्ध वस्तुएं भूलकर भी न रखे.
क्या है इस यात्रा की खासियत
इस यात्रा की सबसे अनोखी बात यह है कि भगवान स्वयं मंदिर से बाहर आकर भक्तों को दर्शन देते है. हर साल इन रथों का निर्माण नए सिरे से किया जाता है और हजारों कारीगर इसमें जुटते हैं. जगन्नाथ रथ यात्रा केलव एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और संस्कृति का अद्भुत संगम है. जिसमें देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर से श्रद्धालु शामिल होते है.

