हेमंत शर्मा, इंदौर। नेमीनगर के विद्यासागर उद्यान में जैन संत की समाधि के बाद हुई अग्नि क्रिया अब सियासी और प्रशासनिक विवाद का रूप लेती नजर आ रही है। नगर निगम की नेता प्रतिपक्ष सोनिला मिमरोट भाटिया ने महापौर पुष्यमित्र भार्गव को पत्र लिखकर सार्वजनिक गार्डन में अंतिम संस्कार की घटना पर कार्रवाई की मांग की है। लेकिन इस पत्र के बाद जैन समाज में नाराजगी है और सवाल उठ रहा है कि क्या धार्मिक परंपरा की पूरी जानकारी लिए बिना नेता प्रतिपक्ष ने इस मामले को जनस्वास्थ्य और पर्यावरण से जोड़कर अनावश्यक विवाद खड़ा कर दिया?

नेता प्रतिपक्ष ने अपने पत्र में लिखा है कि नेमीनगर के आचार्य विद्यासागर उद्यान में अंतिम संस्कार किया गया, जिसे उन्होंने पर्यावरण की शुद्धता और जनस्वास्थ्य की दृष्टि से गंभीर और नुकसानदायक बताया है। पत्र में उन्होंने बगीचे में अंतिम संस्कार करने वालों की पहचान कर उनके खिलाफ जनस्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने के आरोप में पुलिस में प्रकरण दर्ज करने की मांग भी की है।

सवाल सिर्फ अंतिम संस्कार का नहीं, धार्मिक परंपरा की समझ का भी

जैन समाज का कहना है कि यह सामान्य व्यक्ति का अंतिम संस्कार नहीं था, बल्कि दिगंबर जैन परंपरा के अनुसार एक क्षुल्लक की अग्नि क्रिया थी। समाज की ओर से जारी वर्जन में बताया गया है कि 11 अगस्त को नेमीनगर जिनालय में प्राकृताचार्य आचार्य सुनील सागर जी महाराज के संघस्थ क्षुल्लक सुलब्धि सागर जी की समाधि हुई थी और 12 अगस्त को उनकी अग्नि क्रिया विद्यासागर उद्यान में की गई।समाज का दावा है कि इसी उद्यान में पहले भी दो समाधियों की अग्नि क्रिया हो चुकी है। दिगंबर जैन परंपरा के अनुसार साधु, ऐलक, क्षुल्लक या साध्वी का अंतिम संस्कार सामान्य श्मशान घाट में नहीं किया जाता। ऐसे में समाज अब पूछ रहा है कि जिस परंपरा के तहत पहले भी इसी स्थान पर समाधि क्रिया हो चुकी है, उसे अचानक अपराध और जनस्वास्थ्य के खतरे से जोड़ने की जरूरत क्यों पड़ी?

पुलिस को सूचना थी, फिर पत्र में कार्रवाई की मांग क्यों?

जैन समाज की ओर से यह भी कहा गया है कि अंतिम क्रिया से पहले पुलिस को सूचना दी गई थी। समाज के अनुसार संबंधित धार्मिक परंपरा के तहत ही पूरी प्रक्रिया संपन्न की गई।ऐसे में विवाद का बड़ा सवाल यह बन गया है कि क्या पुलिस को सूचना और नगर निगम की अनुमति दो अलग-अलग प्रक्रियाएं थीं? यदि नगर निगम की अनुमति जरूरी थी तो प्रशासनिक स्तर पर इस स्थिति को संवाद से सुलझाने के बजाय सीधे पुलिस कार्रवाई की मांग करना कितना उचित था?

नेता प्रतिपक्ष के पत्र की भाषा पर भी उठे सवाल

महापौर को भेजे पत्र में नेता प्रतिपक्ष ने घटना को पर्यावरण प्रदूषण और जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर बताया है। साथ ही संबंधित लोगों की पहचान कर उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने का आग्रह किया है।यहीं से जैन समाज की नाराजगी और बढ़ गई है। समाज का तर्क है कि धार्मिक रीति से संत की अग्नि क्रिया को सीधे “जनस्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने” वाली घटना के रूप में पेश करना धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला है।

क्या निगम के नियम और धार्मिक परंपरा के बीच संवाद की जगह कार्रवाई जरूरी थी?

सार्वजनिक पार्क के इस्तेमाल को लेकर नगर निगम के नियम अपनी जगह हैं और यदि अनुमति संबंधी कोई प्रक्रिया पूरी नहीं हुई थी तो प्रशासन उस पर सवाल उठा सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस विवाद का समाधान बातचीत से नहीं निकाला जा सकता था?एक तरफ निगम के नियमों का सवाल है, दूसरी तरफ सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा का। ऐसे संवेदनशील मामले में सीधे आपराधिक कार्रवाई की मांग करने से पहले संबंधित समाज से संवाद किया जाता तो शायद विवाद इतना नहीं बढ़ता।

नेमीनगर में पहले भी हुई समाधियां, फिर अचानक क्यों बना मुद्दा?

जैन समाज का दावा है कि विद्यासागर उद्यान में पहले भी दो समाधियों की अग्नि क्रिया हो चुकी है। यदि यह दावा सही है तो अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पहले भी इसी तरह की प्रक्रिया पर नगर निगम ने आपत्ति दर्ज की थी?अगर नहीं, तो इस बार अचानक पत्र लिखकर पुलिस कार्रवाई की मांग क्यों की गई? और अगर पहले भी आपत्ति थी, तो अब तक नियमों को स्पष्ट रूप से लागू क्यों नहीं कराया गया?

धर्म की आस्था बनाम निगम के नियम—बीच का रास्ता कौन निकालेगा?

नेमीनगर का विवाद अब सिर्फ एक गार्डन में हुई अग्नि क्रिया तक सीमित नहीं है। मामला इस बात का उदाहरण बन गया है कि धार्मिक परंपराओं और प्रशासनिक नियमों के बीच टकराव की स्थिति में प्रशासन का रवैया कैसा होना चाहिए।जैन समाज साफ तौर पर कह रहा है कि यह कोई मनमानी गतिविधि नहीं, बल्कि क्षुल्लक की समाधि के बाद निभाई गई धार्मिक परंपरा है। दूसरी ओर नगर निगम के स्तर पर सार्वजनिक उद्यान के इस्तेमाल को लेकर नियमों का सवाल उठाया जा रहा है।ऐसे में अब सवाल नेता प्रतिपक्ष के पत्र से भी आगे निकल गया है—क्या इस पूरे मामले में पहले धार्मिक परंपरा को समझने और समाज से संवाद करने की जरूरत थी, या सीधे कार्रवाई की मांग करना ही पहला कदम होना चाहिए था?

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