अत्याधिक निकटता से घटता सम्मान बहुत पीढ़ा दायक होता है। मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा है कि जो सहज उपलब्ध होता है उसका मूल्य कम ही आँका जाता है। मशहूर शायर नासिर काज़मी की ग़ज़ल के एक शेर का मिसरा-ए-सानी “तूं भी दिल से उतर ना जाए कहीं” पढ़कर इस लेख के भाव को आसानी से समझा जा सकता है। किसी भी रिश्ते मे प्रेम और अपनापन की कशिश तभी तक रहती है जब तक उनमें सम्मान और मर्यादा का संतुलन बना रहता है। अनिवार्य सीमाओं को मिटा देने वाली निकटता और घनिष्ठता धीरे-धीरे कब उपेक्षा बनने लगती है पता ही नहीं चलता।
एक अंग्रेज़ी कहावत “Familiarity breeds contempt” और उसी वज़न का एक हिंदी मुहावरा “घर की मुर्गी दाल बराबर” दोनों एक ही संदेश देने वाले हैं कि निरंतर उपलब्ध रहने वाली चीज़ों का महत्व कम होने लगता है। इसलिए रिश्तों मे अपना सम्मान बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है जितना दूसरों का सम्मान करना। सभी को समय, प्रेम और आदर देते हुए स्वयं को कभी इतना सस्ता न होने दें कि आप बहुत सामान्य और महत्वहीन लगने लगे।
बड़ भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा॥
रामचरित मानस की इस प्रसिद्ध पंक्ति का भी यही संदेश है कि मानव जीवन बहुत मूल्यवान है इसलिए अपने व्यक्तित्व और अस्तित्व का सम्मान बनाए रखना हमारा अपना दायित्व होता है।
स्वाभिमान अहंकार नहीं आत्मसम्मान की पहचान है। रिश्तों में दूरी अच्छी बात नहीं है मगर फिर भी एक स्वस्थ सीमा आवश्यक है।स्मरण रहे जब व्यक्ति स्वयं का सम्मान करता है तभी संसार भी उसका सम्मान करता है। अपनी भावना, समय,कौशल और व्यक्तित्व का सही मूल्य समझिए। कभी-कभी मौन रहना और सीमित उपलब्धता भी संबंधों की गरिमा बनाए रखती है।
संबंधों मे एक सूक्ष्मता का खयाल हमेशा रहे प्रेम का अर्थ स्वयं को खो देना नहीं बल्कि स्वयं के मूल्य को बनाए रखते हुए दूसरों को अपनाना होता है। जीवन के आवश्यक रिश्तों में वही संतुलन प्रशंसा पाते हैं जिसमे आप सम्मान से किसी के हृदय मे रहें और कोई आपका अपना आपके दिल से उतरने भी न पाए।
संदीप अखिल
सलाहकार संपादक
न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम

