Change is the only constant. समय के साथ मानव, समाज और मान्यताएं बदलती रही हैं । किसी एक दौर की उपयोगी परंपरा किसी दूसरे दौर में अप्रासंगिक भी हो सकती है। समय की माँग को समझकर स्वयं को बदलना कमजोरी नही विवेक और प्रगतिशीलता का प्रमाण है।
जब प्रकृति प्रदत्त मौसम टिक कर नही रह पाता तो कोई मान्यता कैसे बरसों बरस बनी रह सकती है। प्रकृति भी परिवर्तन का शाश्वत संदेश देती है तो मानव और मानवीय परम्पराएं कैसे अटल ,अडिग और अपरिवर्तनशील रह सकती है। मौसम बदलते हैं, परिस्थितियाँ बदलती हैं और जीवन की आवश्यकताएँ बदलती हैं तो मनुष्य द्वारा बनाई गई परिपाटियाँ और व्यवस्थाएँ हमेशा एक जैसी कैसे रह सकती हैं? इतिहास साक्षी है कि समाज ने समय के साथ अनेक कुरीतियों, रूढ़ियों और परिपाटियों से पीछा छुड़ाया है। सभी जानते हैं भारत में सती प्रथा, बाल विवाह, दहेज और छुआछूत जैसी सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध हुए सुधारों ने समाज को नई दिशा दी है जिसकी आज भी प्रशंसा की जाती है।हाल फ़िलहाल में देश की राजनीति भी इसी टकराव से गुज़र रही है बदलाव के कुछ मुद्दे विवाद के मुद्दे बने हुए हैं जैसे वंदेमातरम के गायन पर विवाद, आरक्षण पर विवाद, तिरंगे पर विवाद, हिजाब पर विवाद,मनुस्मृति पर विवाद आदी इत्यादि। काल परिस्थिति और समय की माँग पर धर्म ग्रंथ की बातों और संविधान में भी सशोधन होता रहा है और होना भी चाहिए।
कालः पचति भूतानि कालः संहरते प्रजाः।
कालः सुप्तेषु जागर्ति कालो हि दुरतिक्रमः॥
आचार्य चाणक्य के और महाभारत के स्त्रीपर्व से लिए गए इस श्लोक का अर्थ है कि काल सभी प्राणियों को परिपक्व करता है और समय आने पर उनका अंत भी करता है। काल स्वयं जाग्रत रहता है और उसकी गति को कोई नही रोक सकता।
व्यक्तिगत जीवन हो, सामाजिक व्यवस्था हो या राष्ट्रीय राजनीति, उचित परिवर्तन के लिए उदार दृष्टि और साहस आवश्यक है। बदलाव का विरोध केवल इसलिए नहीं होना चाहिए कि वह बदलाव हमारी पुरानी आदतों या अहं को चुनौती देता है। विचारों पर विमर्श होना चाहिए, कुछ असहमति हो फिर भी राष्ट्र और समाज के व्यापक हित में समयानुकूल सुधार के द्वार खुले रखने चाहिए।
सच्ची परंपरा वही है जो जीवन को बेहतर बनाए, सच्चा परिवर्तन वही है जो मानवता को आगे ले जाए। परिवर्तन से डरने की बजाय उसके औचित्य को समझना ज़्यादा ज़रुरी है। समय का सम्मान यही है कि हम अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए भी भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप स्वयं को ढालते रहें। जिसमें लचीलापन नही रहता वो प्रासंगिक भी नही रहता। कठोर सत्य यही है मानव जीवन की सुविधा और व्यवस्था के लिए बनाए गए नियम को मानव ही समयानुकूल कर सकता है।

संदीप अखिल, सलाहकार संपादक, न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम


