Anger is a bad advisor… हाल ही में हुए छत्रपति संभाजीनगर की खावड्या डोंगर पहाड़ी की दर्दनाक घटना ने पूरे देश को दहला दिया है. एक किशोर की ज़िद ने पूरे परिवार को निगल लिया. तुच्छ भौतिक वस्तु की चाहत और क्षणिक आवेश का दुष्परिणाम देख कर हृदय भीतर तक कम्पित हो गया. बेहद मार्मिक उदाहरण बनकर सामने आने वाली इस घटना में 18 वर्षीय कुणाल चांदगुडे और उसके माता-पिता की जान चली गई. यह त्रासदी आज की युवा पीढ़ी और पूरे समाज के लिए गंभीर चेतावनी है. मोबाइल, आईफोन, महंगी कारें, ब्रांडेड कपड़े और सोशल मीडिया की चमक हमारी जरूरत से बढ़कर हमारी पहचान और प्रतिष्ठा का पैमाना बनने लगे तो होती है समस्या शुरू. अब कोई किसी को यह नही समझाता कि महंगी चीज़ें इंसान को बड़ा नहीं बनाती, आदमी को बड़ा बनाता है उसका चरित्र, व्यवहार, संघर्ष और व्यक्तित्व. परिवार में बच्चों और उसके माता-पिता के बीच की बढ़ती दूरियाँ, एकल परिवार की नवीन अवधारणा, अत्याधिक आभाव, बेहिसाब समृद्धि, अनंत मानसिक तनाव, अतिरेक लाड दुलार और कभी-कभी शारीरिक या मानसिक दुर्बलता ही अक्सर ऐसी लोमहर्षक दुर्घटनाओं की वजह बनती है.

बच्चों के सपनों को रोकने से बेहतर है उन्हें सपनों तक पहुंचने का सही रास्ता दिखाया जाए. उन्हें यह समझाना होगा कि जिनके पास आज क़ीमती कारें है शुरुआत में उनके पास भी तुम्हारी तरह साइकिल हुआ करती थी. मेहनत से ही साधारण फोन को महँगे फोनों में बदला जा सकता है. आज के दौर में एक तुच्छ वस्तु के लिए अपना बेशक़ीमती जीवन, समूचा कुल और रिश्तों को दाँव पर लगाया जा रहा है. दुनियाँ किस ओर जा रही है यह विषय चिंतनीय है . इस दिशा में परिवार और स्कूल दोनों को अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी . अपने बच्चों को सुविधाओं के साथ, अपना समय, पारिवारिक संस्कार, संवाद और संवेदनशीलता देकर भी समृद्ध करें. माता-पिता हमेशा यह जानने की कोशिश क़रें कि आख़िर उनके बच्चों के मन में क्या चल रहा है? यह भी पता क़रें कि बच्चे जिन सपनों के पीछे भाग रहे हैं उसमें हासिल क्या है? मोटिवेट करने वाला सोशल मीडिया उन्हें प्रेरित कर रहा है या उन पर कोई दबाव में डाल रहा है?

माता-पिता के सुख और आदेशों पर सर्वत्र गँवा देने वाले प्रभु श्रीराम और श्रवण कुमार जैसे आदर्शों के इस देश में नई पौध कितनी भटक गई है. इनके सुधार के लिए मूल्यवान बातों को और जीवन रूपांतरित करने वाले संदेशों को अब किताबों से निकाल कर सभी के व्यवहार में लाना होगा, यह कार्य जिनका भी दायित्व है उन्हें अब चैतन्य हो जाना चाहिए. यह कभी ना भूलें कि एक फोन फिर खरीदा जा सकता है, एक कार फिर खरीदी जा सकती है, लेकिन खोया हुआ जीवन कोई वापस लाकर कर दिखाए.

युवाओं से बारम्बार आग्रह है कि कोई ऐसा सपना अपनी आँखों में ना पालें जो उनके जीवन से भी बड़ा हो जाए. इच्छाएं तभी तक शुभ हैं जब तक उसने विवेक की उंगली थामी हुई है अन्यथा अराजक कामनाएं मौत के मुहाने तक भी ले जा सकती हैं. क्रोध और ज़िद में लिए गए निर्णय की परिणिति देखकर आपसे कहा जा रहा है कि अपने बच्चों को और स्वयं को सिर्फ़ सफल ही नहीं समझदार और संवेदनशील भी बनाए  क्योंकि नासमझ जिद कभी भी ज़िंदगी से बड़ी नहीं हो सकती.

संदीप अखिल

सलाहकार संपादक

न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम