रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े एक मामले में PMLA की कार्रवाई को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि Predicate Offence यानी मूल अपराध में बरी होने मात्र से PMLA के तहत चल रही कार्रवाई स्वतः समाप्त नहीं हो जाती। यदि निचली अदालत के बरी करने के आदेश के खिलाफ अपील का कानूनी रास्ता खुला है या अपील की समय-सीमा अभी समाप्त नहीं हुई है, तो उस आदेश को PMLA की कार्रवाई के खिलाफ अंतिम सुरक्षा के तौर पर नहीं माना जा सकता।
यह आदेश जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद की सिंगल बेंच ने अमर मंडल की याचिका पर सुनाया। याचिकाकर्ता ने ED की ओर से PMLA की धाराओं 3 और 4 के तहत दर्ज ECIR को रद्द करने की मांग की थी।
क्या था पूरा मामला?
मामला कथित अवैध कोयला परिवहन से जुड़ा है। अमर मंडल के खिलाफ IPC की धारा 414 और 120B तथा Mines and Minerals (Development and Regulation) Act की धाराओं 4 और 21 के तहत मामला दर्ज किया गया था।
गोड्डा के न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी की अदालत ने 10 फरवरी 2026 को इन मूल अपराधों से जुड़े मामले में अमर मंडल को बरी कर दिया था। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए तर्क दिया कि जब Predicate Offence में उन्हें बरी किया जा चुका है, तो उसी मामले के आधार पर PMLA की कार्रवाई भी समाप्त होनी चाहिए।
बरी होने का आदेश अंतिम होना जरूरी
हाईकोर्ट ने माना कि यदि किसी आरोपी को Scheduled Offence से अंतिम रूप से राहत मिल जाती है—चाहे डिस्चार्ज, बरी या क्वैश के जरिए—तो उस स्थिति में उस अपराध पर आधारित मनी लॉन्ड्रिंग की कार्रवाई आगे नहीं बढ़ सकती।
हालांकि, कोर्ट ने पाया कि अमर मंडल के मामले में बरी होने का आदेश अभी अंतिम रूप नहीं ले चुका है। निचली अदालत के फैसले को सक्षम अपीलीय अदालत में चुनौती दी जा सकती है और अपील की कानूनी अवधि भी प्रासंगिक है। ऐसे में इस स्तर पर PMLA की कार्रवाई समाप्त करने का आधार नहीं बनता।
85 लाख रुपये कैश और 8.94 करोड़ के लेन-देन का भी जिक्र
हाईकोर्ट ने मामले में जब्त सामग्री और वित्तीय लेन-देन से जुड़े पहलुओं को भी महत्वपूर्ण माना। कोर्ट के समक्ष यह तथ्य आया कि निचली अदालत का फैसला कथित तौर पर एक ट्रक से जुड़े अवैध कोयला परिवहन के आरोपों तक सीमित था।
वहीं, 85 लाख रुपये नकद की बरामदगी, 134 मूल संपत्ति दस्तावेज और बैंक खातों में करीब 8.94 करोड़ रुपये के बताए गए लेन-देन से जुड़े पहलुओं पर ट्रायल कोर्ट ने कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया था।
कोर्ट ने इसी आधार पर कहा कि केवल कोयला परिवहन से जुड़े मूल मामले में बरी होना, जब्त संपत्तियों और अन्य वित्तीय पहलुओं से संबंधित PMLA कार्रवाई के खिलाफ पूर्ण सुरक्षा नहीं माना जा सकता।
PMLA एडजुकेटिंग अथॉरिटी के सामने भी मामला लंबित
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि जब्त संपत्तियों से संबंधित कार्यवाही PMLA Adjudicating Authority, नई दिल्ली के समक्ष जारी है। याचिकाकर्ता इस प्रक्रिया में शामिल भी हुआ था और PMLA की धारा 8(1) के तहत जारी शो-कॉज नोटिस का विस्तृत जवाब दाखिल कर चुका था।
ECIR को FIR के समान नहीं माना जा सकता
अमर मंडल की ओर से ED की ECIR रद्द करने की मांग भी हाईकोर्ट ने स्वीकार नहीं की। कोर्ट ने कहा कि ECIR को सामान्य FIR के बराबर नहीं माना जा सकता। यह ED का आंतरिक दस्तावेज है, जिसका उपयोग जांच शुरू करने और आगे की कार्रवाई के लिए किया जाता है।
कोर्ट के मुताबिक, केवल ECIR दर्ज होने से यह नहीं माना जा सकता कि आरोपी के खिलाफ उसी समय आपराधिक मुकदमा शुरू हो गया है। यह जांच से संबंधित आंतरिक रिकॉर्ड है।
अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप से इनकार
हाईकोर्ट ने कहा कि जब ED की जांच और जब्त संपत्तियों से जुड़ी वैधानिक कार्यवाही अभी जारी है, तब संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत इस स्तर पर ECIR में हस्तक्षेप कर उसे रद्द करना उचित नहीं होगा।
इस आधार पर कोर्ट ने अमर मंडल की याचिका को राहत देने से इनकार कर दिया। मामले में PMLA के तहत चल रही प्रक्रिया फिलहाल जारी रहेगी।



