रायपुर। झीरम घाटी नक्सली हमले के मामले में एनआईए की विशेष अदालत के फैसले के बाद पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सवाल उठाए हैं। अदालत ने मामले में 10 आरोपियों को दोषी करार दिया है और 16 सितंबर को सजा सुनाई जाएगी। फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए बघेल ने इसे “अधूरा न्याय” बताया है।

भूपेश बघेल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि झीरम घाटी में रचा गया षडयंत्र लोकतंत्र के इतिहास के सबसे बड़े राजनीतिक नरसंहारों में से एक था। उन्होंने कहा कि ऐसे मामले में निचले स्तर के सिर्फ 10 नक्सलियों को सजा मिलना न्याय नहीं कहा जा सकता।
बघेल ने कहा कि झीरम मामले की जांच कर रही एनआईए ने खुद कहा था कि इस घटना को करीब 200 लोगों ने अंजाम दिया था। उन्होंने दावा किया कि एनआईए ने 39 लोगों को आरोपी बनाया था, लेकिन जांच में लगातार लापरवाही के चलते 10 से अधिक लोगों को पकड़ा नहीं जा सका।
पूर्व मुख्यमंत्री ने यह भी आरोप लगाया कि नक्सलियों के शीर्ष नेताओं के नाम पहले ही एफआईआर से हटा दिए गए थे। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि “पता नहीं किसके कहने पर” ऐसा किया गया।
‘राजनीतिक षडयंत्र की जांच आज तक नहीं हुई’
भूपेश बघेल ने कहा कि झीरम कांड के पीछे कथित राजनीतिक षडयंत्र की जांच आज तक नहीं हुई है। उन्होंने जांच आयोग और आपराधिक जांच के बीच अंतर बताते हुए कहा कि जांच आयोग ने केवल सुरक्षा व्यवस्था में कमी के पहलू की जांच की थी, जबकि उसका उद्देश्य आपराधिक मामले में दोषियों को सजा दिलाना नहीं था।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी और पीड़ित परिवार लगातार यह कहते रहे हैं कि झीरम में व्यापक राजनीतिक षडयंत्र हुआ था और इसकी जांच जरूरी है। बघेल के मुताबिक, एनआईए ने इस पहलू की जांच नहीं की।
जितेंद्र मुदलियार की शिकायत और दूसरी FIR का जिक्र
बघेल ने अपने बयान में 2020 में शहीद उदय मुदलियार के बेटे जितेंद्र मुदलियार की शिकायत के बाद दर्ज हुई दूसरी एफआईआर का भी जिक्र किया।
उन्होंने कहा कि इस एफआईआर के बाद एनआईए ने आपत्ति जताई और इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गई। बघेल के अनुसार, नवंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने एनआईए की आपत्ति खारिज कर दी थी।
पूर्व मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि तब तक राज्य में भाजपा की सरकार वापस आ चुकी थी और इसके बाद ढाई साल बीत जाने के बावजूद इस एफआईआर पर कोई जांच नहीं की गई।
बघेल ने आरोप लगाया कि भाजपा कथित आपराधिक षडयंत्र की जांच नहीं होने देना चाहती। उन्होंने कहा कि इसके पीछे क्या कारण है, यह लोग समझते हैं।
जांच आयोग पर भी भाजपा को घेरा
भूपेश बघेल ने 2013 में गठित जांच आयोग का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि घटना के बाद गठित आयोग को सुरक्षा में हुई कमी की जांच करनी थी, न कि आपराधिक मामले में सजा दिलाने के लिए जांच करनी थी।
बघेल के मुताबिक, जस्टिस प्रशांत मिश्रा जांच आयोग ने अपनी रिपोर्ट पेश की थी। इसके बाद छत्तीसगढ़ सरकार ने रिपोर्ट को अधूरा बताते हुए उसे पूरा करने के लिए जस्टिस मिन्नहाजुद्दीन और जस्टिस सतीश अग्रिहोत्री के नेतृत्व में नया जांच आयोग बनाया था।
उन्होंने कहा कि इस नए जांच आयोग के खिलाफ भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष धरमलाल कौशिक हाईकोर्ट पहुंचे थे। उनकी याचिका के बाद आयोग पर रोक लगा दी गई, जो बघेल के अनुसार आज भी प्रभावी है।
‘जांच होगी तभी मिलेगा पूरा न्याय’
भूपेश बघेल ने कहा कि झीरम घाटी में हुए आपराधिक षडयंत्र की पूरी जांच के बिना इस मामले को न्याय की पूर्ण परिणति तक पहुंचा हुआ नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि “जब तक यह जांच नहीं होगी, तब तक झीरम का न्याय अधूरा रहेगा।”
ये 10 आरोपी दोषी करार
एनआईए की विशेष अदालत के ताजा फैसले में 10 आरोपियों को दोषी ठहराया गया है। अब 16 सितंबर को होने वाली सजा की सुनवाई के साथ-साथ राजनीतिक षडयंत्र की जांच को लेकर भूपेश बघेल द्वारा उठाए गए सवाल भी चर्चा के केंद्र में हैं।
एनआईए की विशेष अदालत ने जिन 10 आरोपियों को दोषी माना है, उनमें—
प्रमिला मोडियम
चैतू लेकाम उर्फ मुन्ना
सुमित्रा उर्फ सुमित्रा पुनेम मोडियम
मुक्का मांडवी
कोसा कवासी उर्फ कोसाराम
आयता मरकाम
मदकामी देवा
जोगा मदकामी
बनजामी सन्ना उर्फ चमरू उर्फ डेंगा
महादेव नाग
शामिल हैं।
मामले में कुल 11 आरोपियों के खिलाफ सुनवाई चल रही थी। इनमें से एक आरोपी की सुनवाई के दौरान मौत हो चुकी है। अब बचे 10 आरोपियों को अदालत ने दोषी करार दिया है और 16 सितंबर को सजा सुनाई जाएगी। बचाव पक्ष के वकील अरविंद चौधरी ने फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही है।
25 मई 2013 को हुआ था झीरम घाटी हमला
झीरम घाटी हमला 25 मई 2013 को हुआ था। उस समय छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होने थे और कांग्रेस प्रदेशभर में परिवर्तन यात्रा निकाल रही थी। सुकमा में परिवर्तन यात्रा की सभा के बाद कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं का काफिला जगदलपुर की ओर लौट रहा था।
काफिले में करीब 25 गाड़ियां और लगभग 200 नेता-कार्यकर्ता शामिल थे। सबसे आगे कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल और कवासी लखमा की गाड़ी थी। उनके पीछे महेंद्र कर्मा और मलकीत सिंह गैदू की गाड़ी तथा उसके बाद बस्तर के कांग्रेस प्रभारी उदय मुदलियार का वाहन था।
दोपहर करीब 3:40 बजे काफिला झीरम घाटी पहुंचा। यहां नक्सलियों ने पेड़ गिराकर रास्ता रोक दिया। गाड़ियां रुकते ही बड़ी संख्या में नक्सलियों ने फायरिंग शुरू कर दी। करीब डेढ़ घंटे तक गोलीबारी चली।
हमले में नंदकुमार पटेल और उनके बेटे दिनेश पटेल की मौत हो गई। बाद में नक्सलियों ने काफिले की गाड़ियों की तलाशी ली और सलवा जुडूम आंदोलन के प्रमुख नेता महेंद्र कर्मा को भी निशाना बनाया। उनकी भी हत्या कर दी गई। इस हमले में कांग्रेस के कई अन्य नेता और कार्यकर्ता भी मारे गए थे।
झीरम घाटी हमला छत्तीसगढ़ के इतिहास की सबसे बड़ी राजनीतिक हिंसक घटनाओं में शामिल है। अब एनआईए अदालत के फैसले के बाद 10 आरोपियों के दोषी ठहराए जाने से मामले का एक अहम कानूनी चरण पूरा हुआ है, लेकिन भूपेश बघेल द्वारा उठाए गए कथित राजनीतिक षडयंत्र की जांच के सवाल ने इस मामले को एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।
Follow the LALLURAM.COM MP channel on WhatsApp
https://whatsapp.com/channel/0029Va6fzuULSmbeNxuA9j0m



