Lalluram Desk. बांग्लादेश में पाकिस्तान के दौर वाले अपने अतीत के साथ मुश्किल रिश्तों को लेकर एक नई राजनीतिक बहस छिड़ गई है। यह विवाद तब शुरू हुआ जब ढाका यूनिवर्सिटी सेंट्रल स्टूडेंट्स यूनियन (DUCSU) के नए बने म्यूज़ियम में मुहम्मद अली जिन्ना को प्रमुखता से दिखाया गया, जबकि शेख मुजीबुर रहमान की कई अहम तस्वीरें वहां से हटा दी गईं।

इस बदलाव की बांग्लादेश के राजनीतिक समूहों ने आलोचना की है। उन्होंने मौजूदा DUCSU लीडरशिप पर आरोप लगाया है कि वे पाकिस्तान बनाने में शामिल रहे व्यक्ति को तो बढ़ावा दे रहे हैं, लेकिन मुजीब की मौजूदगी को कम कर रहे हैं, जिनकी लीडरशिप ने बांग्लादेश की आज़ादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई थी।

यह विवाद 5 अगस्त, 2024 को शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद बांग्लादेश में हो रहे बड़े राजनीतिक बदलावों के बीच सामने आया है। इसने आलोचकों के बीच यह चिंता भी बढ़ा दी है कि पाकिस्तान-समर्थक और इस्लामी राजनीतिक ताकतों को देश की मुख्यधारा की राजनीति में ज़्यादा जगह मिल रही है।

जिन्ना को मिली अहम जगह, मुजीब की विरासत कम की गई

नए बने म्यूज़ियम में 1921 में ढाका यूनिवर्सिटी की स्थापना से लेकर जुलाई विद्रोह और हाल की राजनीतिक घटनाओं तक का इतिहास दिखाया गया है। अब इसमें जिन्ना की तीन प्रमुख तस्वीरें शामिल हैं।

बांग्लादेशी न्यूज़ चैनल Bdnews24 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें रेसकोर्स ग्राउंड में 1948 में दिए गए उनके भाषण से जुड़ी एक तस्वीर, 1940 का लाहौर सम्मेलन (जहां अलग मुस्लिम देश का प्रस्ताव पास हुआ था) और ‘डॉन’ अखबार में छपी 1970 के चुनाव की रिपोर्ट शामिल है।

दिखाई गई तस्वीरों में से एक जिन्ना के भाषा से जुड़े विवादित रुख से संबंधित है, जिसमें उन्होंने कहा था कि उर्दू ही पाकिस्तान की एकमात्र सरकारी भाषा होनी चाहिए।

हालांकि, नए बने हिस्से में मुजीब की वैसी कोई अलग तस्वीर नहीं है। उनकी मौजूदगी मुख्य रूप से अखबार की कतरनों और 1971 से 1975 के बीच उनके बेटों की शादियों से जुड़ी तस्वीरों तक ही सीमित है।

खबरों के मुताबिक, उनके राजनीतिक करियर के अहम पड़ावों से जुड़ी तस्वीरें – जैसे भाषा आंदोलन, छह-सूत्रीय आंदोलन, अगरतला षड्यंत्र केस, 1969 का जन-विद्रोह, 1970 का चुनाव और 7 मार्च का उनका भाषण – वहां मौजूद नहीं हैं। DUCSU की ‘लिबरेशन वॉर और मास मूवमेंट’ (आज़ादी की लड़ाई और जन-आंदोलन) मामलों की सेक्रेटरी फ़ातिमा तसनीम ज़ुमा ने बताया कि 5 अगस्त, 2024 के बाद उन लोगों की तस्वीरें हटा दी गईं जिन्हें “फ़ासीवाद” का प्रतीक माना जाता है। जब उनसे पूछा गया कि मुजीब की पुरानी तस्वीरें क्यों नहीं रखी गईं, तो उन्होंने कहा कि उन्होंने उन्हें न रखने का फ़ैसला किया।

म्यूज़ियम में बदलावों को लेकर विरोध

इन बदलावों की आलोचना ‘जातीय छात्र शक्ति’ ने की है। संगठन का आरोप है कि बांग्लादेश में पाकिस्तान-समर्थक राजनीति को फिर से प्रासंगिक बनाने की कोशिश की जा रही है।

ढाका यूनिवर्सिटी में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान (जिसकी रिपोर्ट ‘प्रोथोम आलो’ ने दी है), संगठन ने सवाल उठाया कि जिन्ना को प्रमुख जगह क्यों दी गई, जबकि बांग्लादेश के राजनीतिक और आज़ादी के संघर्षों से जुड़े लोगों को वैसी जगह नहीं मिली।

यह विवाद इसलिए भी अहम है क्योंकि यह म्यूज़ियम बांग्लादेश की सबसे अहम राजनीतिक यूनिवर्सिटीज़ में से एक में स्थित है। ढाका यूनिवर्सिटी का इतिहास भाषा आंदोलन, स्वायत्तता के संघर्ष और 1971 की आज़ादी की लड़ाई से गहराई से जुड़ा रहा है।

इस्लामी राजनीति की बढ़ती मौजूदगी

यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब हसीना के बाद के बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी और दूसरे इस्लामी समूहों की राजनीतिक मौजूदगी बढ़ रही है। जमात, जिसका 1971 की लड़ाई से जुड़ा एक विवादास्पद इतिहास रहा है, पहले भी सरकार के ख़िलाफ़ बड़े विरोध-प्रदर्शन कर चुकी है।

आलोचकों का आरोप है कि ऐसे समूह और उनके समर्थक बांग्लादेश की मुख्यधारा की राजनीति में ज़्यादा कट्टरपंथी और पाकिस्तान-समर्थक आवाज़ों को लाने में मदद कर रहे हैं।

Follow the LALLURAM.COM MP channel on WhatsApp
https://whatsapp.com/channel/0029Va6fzuULSmbeNxuA9j0m