मई और जून के माह भारत में गर्मी के चरम समय माने जाते हैं. इस दौरान कोयल का कूकना कई लोक मान्यताओं और पर्यावरणीय संकेतों से जुड़ा होता है. गर्मी के दिनों में कोयल (कोकिला) का स्वर लोक परंपरा और ज्योतिषीय दृष्टिकोण से विशेष महत्व रखता है. इसे विभिन्न प्रकार की भविष्यवाणियों और संकेतों से जोड़ा गया है, जिनमें से कुछ प्रमुख मान्यताएँ निम्नलिखित हैं:
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- सूर्य की उच्च स्थिति और अग्नि तत्त्व का प्रभाव: मई-जून में सूर्य अपनी उच्च स्थिति में होता है, जिससे अग्नि तत्त्व प्रभावी रहता है. ऐसे में कोयल का कूकना यह दर्शाता है कि भीषण गर्मी के बावजूद प्रकृति में जीवन का संगीत और सौंदर्य विद्यमान है.
- अच्छे मानसून का संकेत: ग्रामीण जनमान्यताओं के अनुसार, यदि कोयल इस समय मधुर और लगातार कूके, तो इसे आने वाले अच्छे मानसून का संकेत माना जाता है.
- शुभ समाचार का प्रतीक: यदि कोई व्यक्ति गर्मियों के दौरान सुबह-सुबह कोयल की पहली कूक सुनता है, तो इसे शुभ समाचार या किसी नए अवसर के आगमन से जोड़ा जाता है.
प्राकृतिक कारण
कोयल का प्रजनन काल मार्च से जून तक होता है. इस अवधि में नर कोयल मादा को आकर्षित करने के लिए मधुर कूजन करता है. इसलिए इस मौसम में उसकी आवाज़ अधिक सुनाई देती है. कोयल आमतौर पर आम के पेड़ों पर रहना पसंद करती है, और गर्मियों में ये पेड़ फलदार होते हैं, जिससे कोयल की गतिविधियाँ भी अधिक बढ़ जाती हैं.

