पटना के गर्दनीबाग धरना स्थल पर कुशल युवा प्रोग्राम (KYP) के केंद्र संचालकों का आंदोलन अब और अधिक उग्र हो गया है। लम्बे समय से चली आ रही प्रशासनिक उपेक्षा और मांगों पर कोई सुनवाई न होने के कारण संचालकों ने अब अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल का रास्ता चुन लिया है। इस आंदोलन को समर्थन देने के लिए राज्य के विभिन्न जिलों से बड़ी संख्या में केंद्र संचालक और ट्रेनिंग ले रहे अभ्यर्थी पटना पहुंचे हैं। संचालकों का साफ कहना है कि यह अस्तित्व की लड़ाई है, जिसे हर हाल में जीता जाएगा।

​25 अगस्त से जारी है धरना, 5 सितंबर को निकलेगा मौन जुलूस

​KYP केंद्र संचालकों ने अपनी विभिन्न समस्याओं को लेकर पहले 20 अगस्त को विरोध-प्रदर्शन किया था। इसके बाद 25 अगस्त से पटना के गर्दनीबाग धरना स्थल पर अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया गया, जो लगातार जारी है। सरकार और संबंधित विभागों के अधिकारियों के रवैये से नाराज संचालकों ने अपने आंदोलन को तेज करते हुए घोषणा की है कि आगामी 5 सितंबर को मुख्यमंत्री सचिवालय तक एक विशाल मौन जुलूस निकाला जाएगा। उनका आरोप है कि लगातार ज्ञापन देने और धरने पर बैठने के बावजूद उनकी मांगों पर शासन स्तर से अब तक कोई ठोस और सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया है।

​100 करोड़ के सॉफ्टवेयर घोटाले और कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल

​भूख हड़ताल की शुरुआत करते हुए संघ के प्रमुख नेता जितेंद्र तिवारी ने सरकार और विभाग के मंत्रियों पर तीखे हमले किए। उन्होंने मंत्रियों द्वारा आंदोलनकारियों को ‘फर्जी’ बताए जाने के बयान पर कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि उन्होंने बिहार कौशल विकास मिशन (BSD) कार्यालय में जाकर अपनी मौजूदगी दर्ज करा दी है ताकि सच्चाई सामने आ सके। तिवारी ने पांच महीने पहले 100 करोड़ रुपये की लागत से बने और महज चार महीने में बंद हुए सॉफ्टवेयर को लेकर बड़ा सवाल उठाया। उन्होंने सरकार से मांग की है कि इस 100 करोड़ रुपये के खर्च का पूरा हिसाब सार्वजनिक किया जाए।

​5 लाख 44 हजार बच्चों के प्रशिक्षण पर असमंजस और आर-पार की लड़ाई

​आंदोलनकारियों के अनुसार, जनवरी से लेकर अब तक कुल 5 लाख 44 हजार बच्चों को प्रशिक्षित किया जाना था, लेकिन जमीनी हकीकत इससे कोसों दूर है। उन्होंने विभाग की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगाते हुए कहा कि कागजी आंकड़ों और वास्तविक संचालन में भारी अंतर है। अधिकारियों की कार्यशैली पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा कि यहां बैठे कुछ लोग खुद को बहुत विद्वान समझते हैं जिन्हें शायद यह भी नहीं पता कि साल में 12 महीने होते हैं या 11 महीने। अपनी मांगों को लेकर अडिग इन संचालकों ने दो टूक शब्दों में ऐलान कर दिया है कि वे या तो अपनी यह लड़ाई जीतकर ही वापस लौटेंगे या फिर धरना स्थल पर ही अपने प्राण त्याग देंगे।