अभय मिश्रा, मऊगंज। मध्य प्रदेश में ‘कागजी’ घोटालों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। आपने कागजों पर सरकारी अस्पताल चलते देखे होंगे, राजधानी भोपाल में कागजों पर दौड़ता ‘श्रीराम कॉलेज’ भी देखा होगा। लेकिन अब विंध्य के मऊगंज जिले से एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने पूरी शिक्षा व्यवस्था, यूनिवर्सिटी प्रशासन और मान्यता देने वाली राष्ट्रीय संस्थाओं की साख को मटियामेट कर दिया है। ‘न्यूज़ 24’ और ‘लल्लूराम डॉट कॉम’ की संयुक्त महा-पड़ताल में यह बड़ा खुलासा हुआ है कि जिले के हनुमना ब्लॉक में एक अदृश्य B.Ed कॉलेज पिछले 12 सालों से सिर्फ फाइलों में फल-फूल रहा है, जबकि जमीनी हकीकत में वहां सिर्फ सन्नाटा और बंजर जमीन है।

खसरा नंबर 1147/1 पर न ईंट, न दीवार… सिर्फ झाड़ियां और खेत

दस्तावेजों के मुताबिक, हनुमना ब्लॉक के पटेहरा गांव के खसरा नंबर 1147/1 पर ‘मां अष्टभुजा कॉलेज ऑफ एजुकेशन’ बकायदा संचालित है। इस तथाकथित संस्थान को ‘निलांचलम सेवा संस्थान’ द्वारा चलाया जा रहा है। जब हमारी टीम ने इस पते पर ग्राउंड जीरो पर जाकर तफ्तीश की, तो जो सच सामने आया वो दंग करने वाला था। जिस जगह पर आलीशान कॉलेज कैंपस, क्लासरूम और लैब होने चाहिए थे, वहां आज तक भवन की एक नींव तक नहीं रखी गई है। पूरी बंजर जमीन सूनी पड़ी है। हद तो यह है कि इस ‘कागजी कॉलेज’ की जमीन तक जाने के लिए 200 मीटर का रास्ता महज 2 फीट चौड़ा है, जहाँ गाड़ी तो दूर, पैदल चलना भी दूभर है।

स्थानीय ग्रामीणों ने कैमरे पर साफ शब्दों में कहा-“साहब! यहां आज तक न तो कोई कॉलेज खुला है, न कोई बिल्डिंग बनी है और न ही कभी यहां कोई छात्र या प्रोफेसर आया है। यह तो खाली खेत है, यहां कॉलेज कहां से आ गया? हमें तो यह भी नहीं पता कि यह किसकी जमीन है और यहाँ क्या होना चाहिए था।”

डिजिटल पड़ताल: MP किसान ऐप और सरकारी नक्शे में उलझा सच

इस अदृश्य कॉलेज का सच तलाशने के लिए जब टीम ग्राउंड जीरो पर भटक रही थी, तब कोई भवन न मिलने पर स्थानीय ग्रामीणों से पूछताछ की गई। ग्रामीणों की अनभिज्ञता के बाद टीम ने तकनीकी सहारा लिया। ‘एम पी किसान ऐप’ पर सीमांक के माध्यम से जब खसरा नंबर 1147/1 की पड़ताल की गई, तब जाकर इस बेनाम जमीन का सही ठिकाना मालूम पड़ा।

इसी रास्ते से अदृश्य कॉलेज पहुंचकर लापता हो जाते हैं छात्र

सरकारी दस्तावेजों और राजस्व रिकॉर्ड के मुताबिक यह पूरा मामला ग्राम पंचायत पटेहरा के अंतर्गत आता है। साल 2015 से लेकर 2026 तक के सरकारी खसरे और नक्शे में यह जमीन बकायदा ‘नीलांचलम सेवा संस्थान’ के नाम पर दर्ज है। कागजों और नक्शों में जमीन तो संस्था के नाम है, लेकिन धरातल पर ईंट-पत्थर का एक टुकड़ा तक मौजूद नहीं है। 

2014 से चल रहा है यह ‘अदृश्य’ खेल, APS यूनिवर्सिटी से प्राप्त है संबद्धता

हैरानी की बात यह है कि यह फर्जीवाड़ा साल 2014 से लगातार जारी है। बिना किसी इंफ्रास्ट्रक्चर के इस अदृश्य संस्थान ने उच्च शिक्षा विभाग की नाक के नीचे सारे नियम-कायदे हवा में उड़ा दिए हैं।

NCTE की मेहरबानी 

नेशनल काउंसिल ऑफ टीचर एजुकेशन (NCTE) द्वारा इस कॉलेज को आईडी NCTE2386240 के तहत बकायदा 100 सीटों की मान्यता मिली हुई है।

यूनिवर्सिटी का ठप्पा

इस कागजी कॉलेज को अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय (APS), रीवा से संबद्धता (Affiliation) भी प्राप्त हो चुकी है और यह 2014 से लगातार संचालित दिखाया जा रहा है।

महा खुलासे के बाद व्यवस्था पर खड़े होते कई बड़े सवाल

इस रोंगटे खड़े कर देने वाले खुलासे के बाद उच्च शिक्षा विभाग, विश्वविद्यालय प्रबंधन और जांच कमेटियों पर कई गंभीर सवालिया निशान खड़े होते हैं। 

आंख मूंदकर भौतिक सत्यापन? 

मान्यता देते समय क्या NCTE और यूनिवर्सिटी के जिम्मेदार अफसरों ने आँखें मूंद रखी थीं? बिना किसी भवन निर्माण के, महज एक खाली बंजर खेत और झाड़ियों को देखकर किस ‘भौतिक सत्यापन’ (Physical Verification) के आधार पर हरी झंडी दे दी गई?

 2 फीट के रास्ते से कैसे गुजरी मान्यता? 

जिस जमीन तक पहुंचने का रास्ता महज 2 फीट चौड़ा हो, जहाँ पैदल चलना भी मुश्किल है, उसे शिक्षा के बड़े केंद्र के रूप में कैसे स्वीकृत कर लिया गया?

 कहां पढ़ रहे हैं 100 छात्र?

अगर यह कॉलेज 2014 से लगातार संचालित है और हर साल 100 बच्चों का एडमिशन हो रहा है, तो वो छात्र कहां बैठकर ‘टीचर ट्रेनिंग’ ले रहे हैं? क्या यह सीधे तौर पर बिना कॉलेज जाए, मोटी रकम लेकर फर्जी डिग्री बेचने का खुला रैकेट नहीं है?

12 सालों तक सोता रहा प्रशासन? 

2014 से लेकर 2026 तक, यानी पिछले 12 सालों से कागजों पर बंटे इस ‘डिग्री’ के खेल की भनक किसी भी प्रशासनिक अधिकारी या उड़नदस्ते को क्यों नहीं लगी?

श्रीराम कॉलेज कांड से क्यों नहीं लिया सबक? 

भोपाल के श्रीराम कॉलेज जैसी बड़ी फर्जीवाड़ा घटनाओं के सामने आने और बदनामी झेलने के बाद भी विंध्य के मऊगंज में यह खेल इतने धड़ल्ले से कैसे चल रहा है?

मध्य प्रदेश में भविष्य के अध्यापकों को गढ़ने वाले B.Ed कॉलेजों का यह हाल यह बताने के लिए काफी है कि सूबे में शिक्षा माफियाओं के हौसले कितने बुलंद हैं। बिना कॉलेज भवन के, बिना किसी फैकल्टी और बिना कक्षाओं के सालों से खुलेआम युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। अब देखना यह है कि इस महा-पड़ताल के बाद जिम्मेदार कुंभकर्णी नींद से जागते हैं या यह ‘अदृश्य’ खेल ऐसे ही बदस्तूर जारी रहता है।

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