अभय मिश्रा, मऊगंज। मध्य प्रदेश के नवनिर्वाचित जिले मऊगंज से प्रशासनिक ढिठाई और व्यवस्था को शर्मसार करने वाला एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने सूबे की कानून व्यवस्था और आदिवासियों के हित के दावों की धज्जियां उड़ा कर रख दी हैं। जिस विभागीय जांच में एक रसूखदार अधिकारी को आदिवासी छात्राओं से रात-बेरात अभद्रता और घोर निंदनीय कृत्य का दोषी पाया गया था। प्रशासन ने उसे सजा देने के बजाय तीन-तीन बालक छात्रावासों के अधीक्षक पद का ‘पुरस्कार’ थमा दिया है। हद तो तब हो गई जब इस महाघोटाले और रक्षक के भक्षक बनने की खबर को साक्ष्यों के साथ उजागर करने वाले ‘न्यूज 24’ और ‘लल्लूराम डॉट कॉम’ के निर्भीक पत्रकार अभय मिश्रा को ही जिला संयोजक ने जेल भेजने की धमकी भरा कानूनी नोटिस थमा दिया।

जब बेटियां नहाती थीं, तब हॉस्टल में घुसता था तत्कालीन मंडल संयोजक मनोज पटेल

यह पूरा मामला 16 सितंबर 2025 का है। तत्कालीन प्रभारी मंडल संयोजक मनोज पटेल के खिलाफ हॉस्टल वार्डन सुकवरिया कोल, पूनम कोल और इंद्रा मिश्रा ने मोर्चा खोला था। आरोप इतने संगीन थे कि रूह कांप जाए। रीवा कमिश्नर के आदेश पर हुई एसडीएम (SDM) की जांच में पीड़ित मासूम बच्चियों ने जो बयान दिए, वो व्यवस्था के मुंह पर करारा तमाचा हैं। छात्राओं ने बताया कि मनोज पटेल सुबह और शाम के वक्त नियमों को ताक पर रखकर कन्या छात्रावास में घुस आता था। 

बच्चियों के मुताबिक, “जब हम नहाते थे, तब वह आ जाता था। हमें अपनी लज्जा बचाने के लिए पानी की टंकी के पीछे छुपना पड़ता था।” वह छात्राओं के कंधों पर हाथ रखता था, उनके कपड़ों के वीडियो बनाता था और वार्डन को बाहर जाने की धमकी देता था। एस डी एम की जांच में इस घिनौने कृत्य की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग,कथन ,जांच प्रतिवेदन , बिल्कुल सही पाया गया था और रिपोर्ट में मनोज पटेल के कृत्य को ‘घोर निंदनीय’ मानते हुए कठोर दंडात्मक कार्रवाई की सिफारिश की गई थी।

न्याय पर पोती कालिख, पूर्व मंडल संयोजक को मिला तीन बालक हॉस्टलों का प्रभार

हैरानी की बात यह है कि 6 फरवरी 2026 को जारी एक सरकारी पत्र ने न्याय की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। घोर अमर्यादित आचरण के दोषी मनोज पटेल को न सिर्फ बहाल किया गया, बल्कि जिला संयोजक ने दरियादिली दिखाते हुए उसे तीन-तीन बालक छात्रावासों का अधीक्षक बना दिया। जब इस संबंध में जिला संयोजक से बात की गई तो उनका रटा-रटाया गैर-जिम्मेदारान जवाब था- “जांच चल रही है।” सवाल उठता है कि जब बेटियों के बयान दर्ज हैं, जब घूसखोरी और बदतमीजी के पुख्ता आडियो-वीडियो प्रमाण मौजूद हैं, तो प्रशासन आख़िर किस बड़ी अनहोनी का इंतज़ार कर रहा है? क्या मासूम बच्चों का भविष्य इस दागी के हाथों में सुरक्षित है?

सच दिखाने पर पत्रकार को BNSS की धारा 223 की धमकी, उठ रहे गंभीर सवाल

जब आरटीआई (RTI) से प्राप्त आधिकारिक जांच रिपोर्ट, पीड़ित बच्चियों और वार्डन पूनम कोल के बयानों के आधार पर न्यूज24 मऊगंज के पत्रकार अभय मिश्रा ने इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया, तो दोषी पर कार्रवाई करने के बजाय विभाग के जिला संयोजक ने पत्रकार को ही दबाने की साजिश रच डाली। पत्रकार को वॉट्सऐप पर नोटिस भेजकर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 223 का हवाला देते हुए तीन दिन में जवाब मांगा गया है और जवाब न देने पर एफआईआर (FIR) दर्ज कराने की धमकी दी गई है। यह सीधे तौर पर चौथे स्तंभ की आवाज को दबाने और प्रशासनिक भ्रष्टाचार को छुपाने का तानाशाही प्रयास है।

बयान बदलने का गंदा खेल: कलेक्टर के स्टेनो और ऑपरेटर पर संगीन आरोप

हॉस्टल की अधीक्षिका पूनम कोल ने एक और चौंकाने वाला खुलासा किया है। उनके अनुसार, एसडीएम के सामने सभी शिकायतकर्ताओं और बच्चियों के मुकम्मल बयान होने के बावजूद, अब उन पर बयान बदलने का चौतरफा दबाव बनाया जा रहा है। अधीक्षिका का सीधा आरोप है कि कलेक्टर कार्यालय में पदस्थ कलेक्टर के स्टेनो सर्वसुख और कंप्यूटर ऑपरेटर कुलदीप शुक्ला द्वारा उन्हें बार-बार बुलाकर बयान बदलने के लिए धमकाया जा रहा है। वे जो निष्पक्ष बयान देना चाहती हैं, उसे कागजों पर दर्ज ही नहीं किया जा रहा है। आखिर मऊगंज प्रशासन को अपने ही एसडीएम की जांच रिपोर्ट पर भरोसा क्यों नहीं है? 50 हजार की रिश्वतखोरी और मासूमों के शोषण के आरोप झेल रहे मनोज पटेल को बचाने के लिए यह पूरा तंत्र क्यों जी-जान से जुटा है?

भोपाल तक गूंजी मऊगंज की गूंज

प्रशासनिक अमले की इस मिलीभगत और तानाशाही के खिलाफ अब राजनीतिक और सामाजिक आक्रोश भी उबलने लगा है। इस पूरे मामले को लेकर बीती 4 जून 2026 को पूर्व विधानसभा प्रत्याशी रामबहोर कोल ने भोपाल स्थित अनुसूचित जाति-जनजाति विभाग के उच्चाधिकारियों से लिखित शिकायत कर इस कड़ी को तोड़ने और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है।

अब देखना यह है कि क्या प्रदेश की सरकार मऊगंज की इन पीड़ित आदिवासी बेटियों को न्याय दिला पाती है या फिर सच की आवाज उठाने वाले पत्रकारों को यूं ही डराकर, भ्रष्टाचारियों और शोषकों को संरक्षण मिलता रहेगा।

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