सोहराब आलम/मोतिहारी। सुगौली प्रखंड के लालपरसा धुमनी टोला में सिकरहना नदी पर करोड़ों की लागत से बनाया गया नया बांध पहली ही बारिश में दम तोड़ता नजर आ रहा है। अभी मानसून ने पूरी तरह से दस्तक भी नहीं दी है कि बांध में दरारें पड़नी शुरू हो गई हैं और जगह-जगह मिट्टी धंसने लगी है। इस स्थिति ने स्थानीय लोगों, विशेषकर किसानों की नींद उड़ा दी है जिन्हें अब हर पल बाढ़ का खतरा सता रहा है।
लापरवाही की भेंट चढ़ी सुरक्षा योजना
ग्रामीणों का स्पष्ट आरोप है कि करोड़ों रुपये की यह सरकारी योजना भारी भ्रष्टाचार और तकनीकी लापरवाही की भेंट चढ़ गई है। निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए लोगों का कहना है कि न तो बांध की पर्याप्त चौड़ाई बढ़ाई गई और न ही इसकी ऊंचाई तय मानकों के अनुरूप रखी गई है। देखने में यह बांध एक मजबूत सुरक्षा दीवार के बजाय महज एक संकरी पगडंडी जैसा प्रतीत होता है जो नदी के बढ़ते दबाव को झेलने में पूरी तरह अक्षम है।
आठ साल से झेल रहे तबाही, अब उम्मीद भी टूटी
स्थानीय निवासी प्रदीप कुमार और मेघन सहनी ने दुख जताते हुए कहा कि वे पिछले आठ वर्षों से हर साल बाढ़ की विभीषिका झेल रहे हैं। उन्हें उम्मीद थी कि इस बार बने नए बांध से उन्हें राहत मिलेगी लेकिन निर्माण के तुरंत बाद ही सामने आई दरारों ने उनकी सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। बाढ़ पूर्व सुरक्षा के नाम पर किए गए दावों की पोल पहली बारिश में ही खुल गई है।
मंडरा रहा बाढ़ का साया
सिकरहना नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ रहा है। स्थिति यह है कि नदी का पानी अब पायलिंग के ऊपर तक पहुंच चुका है। किसानों का कहना है कि यदि बारिश का दौर इसी तरह जारी रहा और समय रहते बांध की मरम्मत नहीं की गई, तो गांव का बाढ़ से बचना असंभव हो जाएगा। ग्रामीणों ने प्रशासन से तत्काल प्रभाव से ठोस कदम उठाने की मांग की है। सवाल यह है कि यदि बाढ़ पूर्व तैयारियों के लिए इतना समय मिलता है, तो फिर इतनी बड़ी चूक क्यों हुई? क्या प्रशासन किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रहा है? फिलहाल, लालपरसा धुमनी टोला के लोग डर के साये में जीने को मजबूर हैं।

