वीरेंद्र कुमार, नालंदा। भारतीय पुस्तकालय विज्ञान के जनक डॉ. एस. आर. रंगनाथन की जयंती के अवसर पर मनाए जाने वाले राष्ट्रीय पुस्तकालयाध्यक्ष दिवस पर ऐतिहासिक राजगीर स्थित नालंदा विश्वविद्यालय में ज्ञान और साहित्य का एक भव्य संगम देखने को मिल रहा है। विश्वविद्यालय परिसर के बहुउद्देशीय सभागार में 14 अगस्त से शुरू हुई पांच दिवसीय विशेष पुस्तक प्रदर्शनी का समापन आज यानी 18 अगस्त को हो रहा है। इस प्रदर्शनी का समय सुबह 10 बजे से शाम 7 बजे तक निर्धारित किया गया है, जहां साहित्य प्रेमियों और शोधार्थियों का तांता लगा हुआ है।
प्रतिष्ठित प्रकाशकों की भागीदारी और दुर्लभ संग्रह
इस भव्य पुस्तक प्रदर्शनी में देश-विदेश के कई प्रतिष्ठित और नामी प्रकाशकों ने हिस्सा लिया है। इनमें भारत सरकार का पब्लिकेशन डिवीजन, मोतीलाल बनारसीदास इंडोलॉजिकल बुक्स, ओरिएंट ब्लैकस्वान प्राइवेट लिमिटेड, पीटर लैंग ग्रुप, नेशनल बुक ट्रस्ट और प्रथम बुक्स जैसे बड़े नाम शामिल हैं। परिसर में कुल 14 बुक स्टॉल लगाए गए हैं, जिन पर साहित्य, इतिहास, दर्शन, प्रबंधन, विज्ञान और अन्य तमाम विषयों की नवीनतम और अत्यंत दुर्लभ किताबें उपलब्ध कराई गई हैं।


शिक्षाविदों और शोधार्थियों के लिए वरदान
नालंदा विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज के विजिटिंग प्रोफेसर पी. के. बिस्वास ने इस आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन शैक्षणिक संस्थानों में बेहद जरूरी हैं। इससे फैकल्टी सदस्यों को किताबें सीधे देखकर अपनी जरूरत के अनुसार चुनने का अवसर मिलता है, जिससे लाइब्रेरी के लिए पुस्तकों की खरीद प्रक्रिया अधिक सुगम और पारदर्शी बनती है। इसके साथ ही, छात्रों को भी किताबों से सीधा जुड़ाव स्थापित करने का बेहतरीन मौका मिलता है, जिससे वे पुस्तकों के विषय, लेखक और विषय-वस्तु को भली-भांति समझ पाते हैं।
प्राचीन ज्ञान परंपरा का पुनरुद्धार
स्कूल ऑफ बुद्धिस्ट स्टडीज, फिलॉसफी एंड कंपैरेटिव रिलिजंस के टीचिंग एसोसिएट और प्रतिष्ठित तिब्बती विद्वान गेशे लुंगटोक शेरप ने इस प्रदर्शनी को विश्वविद्यालय की नई लाइब्रेरी के विकास के लिए एक मील का पत्थर करार दिया। उन्होंने बताया कि तेजी से विकसित हो रहे इस संस्थान में बड़ी संख्या में किताबों और पांडुलिपियों की आवश्यकता है। प्रदर्शनी के माध्यम से बौद्ध दर्शन, नीतिशास्त्र और अंतरराष्ट्रीय संबंधों से जुड़ी कई ऐसी दुर्लभ पुस्तकें सामने आई हैं, जो शोध स्कॉलर्स के लिए बेहद उपयोगी हैं। गेशे लुंगटोक ने प्राचीन नालंदा की गौरवशाली परंपरा का स्मरण करते हुए कहा कि आज का आधुनिक नालंदा विश्वविद्यालय भी तिब्बत, जापान, कोरिया और चीन जैसे देशों के छात्रों को संस्कृत, पाली, तिब्बतन और चाइनीज जैसी भाषाओं की शिक्षा देकर उसी प्राचीन ज्ञान परंपरा को सफलतापूर्वक आगे बढ़ा रहा है।


