दुर्गेश राजपूत, नर्मदापुरम। मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम में सरकारी मूंग खरीदी का खेल इन दिनों चरम पर है। 28.14 करोड़ रुपये के मूंग-मिट्टी घोटाले को पूरे 15 दिन बीत चुके हैं, लेकिन पुलिस के हाथ अब तक खाली हैं। न तो किसी मुख्य आरोपी की गर्दन नापी गई और न ही हथकड़ी लगी। उल्टे ‘अंधेर नगरी, चौपट राजा’ वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए प्रशासन ने उन्हीं विवादित वेयरहाउसों में दोबारा लाल कालीन बिछाकर खरीदी का बाजार सजा दिया है, जिन पर FIR की गाज गिरी थी!

दागियों पर क्यों मेहरबान है सिस्टम?

​कनकधारा ही नहीं, चेतन वेयरहाउस (फुरतला) और राधा कृष्ण वेयरहाउस (काजलखेड़ी) में भी फर्जीवाड़े का घिनौना खेल सामने आया था। समिति प्रबंधकों और सर्वेयरों पर केस दर्ज हुए। उम्मीद थी कि इन्हें ब्लैकलिस्ट किया जाएगा, लेकिन हुआ ठीक उलटा! दो दिन का नाटक और तीसरे दिन फिर वही खरीदी शुरू!​जब इस ‘मेहरबानी’ पर सवाल उठे, तो जिला विपणन अधिकारी अनिल जैन ने जगह की कमी का अजीबोगरीब तर्क दे दिया कि “धान-गेहूं से गोदाम भरे हैं, इसलिए मजबूरी में इन्हीं दागी केंद्रों पर काम चलाना पड़ रहा है।”

​क्या था पूरा ‘मिट्टी’ का खेल?

​माखननगर के कनकधारा वेयरहाउस में जब जांच टीम पहुंची, तो वहां मूंग कम और मिट्टी का ढेर ज्यादा मिला। करीब 31,298 क्विंटल अमानक मूंग में मिलावट का भंडाफोड़ हुआ, जिसकी कीमत 28.14 करोड़ रुपये आंकी गई। आनन-फानन में FIR दर्ज हुई, वेयरहाउस संचालक तारेश पुरोहित, तत्कालीन शाखा प्रबंधक श्याम होसले और जिला प्रबंधक वासुदेव दावंडे पर शिकंजा कसा गया। लेकिन नतीजा? जिला प्रबंधक साहब ‘फरार’ हो गए और पुलिस आज भी कागजी जाल बुनने में व्यस्त है।

​किसानों के साथ ‘मजाक’ कब तक?

​कड़कड़ाती धूप में केंद्रों के बाहर किसान लंबी कतारों में अपनी मेहनत की फसल बेचने के लिए तड़प रहे हैं, और दूसरी ओर सिस्टम माफियाओं की जेबें भरने में व्यस्त है। सवाल यही है कि जिस वेयरहाउस में हाल ही में करोड़ों की मिलावट हुई, वहां अब निष्पक्ष खरीदी की क्या गारंटी? क्या पुलिस कार्रवाई सिर्फ फाइलों में सिमट कर रह जाएगी या फिर बड़े मगरमच्छों पर भी शिकंजा कसेगा?

​7 दिन लाइन में खड़े रहने के बाद बिना तुलाई लौटे किसान

​किसान अरविंद साहू और नीलेश चौधरी ने श्री राधा कृष्ण वेयरहाउस की कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने बताया कि वे अपनी मूंग की फसल बेचने के लिए वेयरहाउस लाए थे, लेकिन कई दिनों तक उनकी फसल की तुलाई नहीं की गई। किसान का आरोप है कि वेयरहाउस में निष्पक्ष व्यवस्था नहीं है; यहाँ किसानों को टोकन तक जारी नहीं किए जाते। पक्षपात का आलम यह है कि बाद में आने वाले किसानों की ट्रॉलियाँ पहले तौल दी जाती हैं, जबकि कतार में लगे किसान इंतजार ही करते रह जाते हैं। ​अरविंद साहू ने बताया कि वे लगातार 7 दिनों तक लाइन में लगे रहे, लेकिन उनका नंबर नहीं आया। आखिरकार अव्यवस्था और भेदभाव से परेशान होकर वे अपनी उपज की ट्रॉली लेकर किसी दूसरी जगह जाने को मजबूर हो गए। वही नीलेश ने बताया कि मुझे 12 दिन हो गए है मेरा नंबर भी निकल गया है मेरी तुलाई नही हुई है।