देश की सरकारी शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत एक बार फिर सामने आई है। नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि देश के हजारों सरकारी स्कूल आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। कई स्कूलों में न बिजली है, न साफ पानी, और न ही छात्राओं के लिए कार्यात्मक शौचालय उपलब्ध हैं।

लड़कियों की शिक्षा पर सबसे बड़ा असर

“भारत में स्कूली शिक्षा प्रणाली” शीर्षक वाली रिपोर्ट के अनुसार, देश के 98,592 स्कूलों में लड़कियों के लिए कार्यात्मक शौचालय नहीं हैं। इसके अलावा 61,540 स्कूलों में सामान्य उपयोग योग्य शौचालय भी उपलब्ध नहीं हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में छात्राओं की पढ़ाई प्रभावित होती है और ड्रॉप-आउट दर बढ़ती है।

1.19 लाख स्कूल अब भी बिजली से दूर

रिपोर्ट बताती है कि पिछले एक दशक में स्कूलों में बिजली की उपलब्धता में सुधार हुआ है। वर्ष 2013-14 में जहां केवल 55 प्रतिशत स्कूलों में बिजली थी, वहीं अब यह आंकड़ा बढ़कर 91.9 प्रतिशत तक पहुंच गया है। इसके बावजूद देश के करीब 1.19 लाख स्कूल आज भी बिजली सुविधा से वंचित हैं।

इसके अलावा:

  • 14,505 स्कूलों में पीने के पानी की सुविधा नहीं
  • 59,829 स्कूलों में हाथ धोने की व्यवस्था नहीं
  • एक शिक्षक के भरोसे चल रहे स्कूल

रिपोर्ट के मुताबिक, देश में 1.04 लाख स्कूल ऐसे हैं जहां केवल एक शिक्षक कार्यरत है। इनमें लगभग 89 प्रतिशत स्कूल ग्रामीण इलाकों में स्थित हैं। इससे शिक्षा की गुणवत्ता और बच्चों के सीखने की क्षमता पर गंभीर असर पड़ रहा है।

बिहार में शिक्षकों की सबसे ज्यादा कमी

शिक्षकों के खाली पदों के मामले में बिहार सबसे आगे है।

बिहार में 2,08,784 पद रिक्त हैं
झारखंड में 80,341 पद खाली
मध्य प्रदेश में 47,122 पद रिक्त हैं
कक्षा 5 के बाद बढ़ रही ड्रॉप-आउट दर

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि कई राज्यों में प्राथमिक शिक्षा के बाद बच्चों का स्कूल छोड़ना गंभीर समस्या बना हुआ है।

पश्चिम बंगाल में ड्रॉप-आउट दर 20 प्रतिशत
अरुणाचल प्रदेश में 18.3 प्रतिशत
कर्नाटक में 18.3 प्रतिशत
असम में 17.5 प्रतिशत दर्ज की गई।

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