वीरेंद्र कुमार/नालंदा: बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान राज्यसभा सांसद नीतीश कुमार आज एक बार फिर अपनी जड़ों की ओर लौटे। अवसर था उनकी धर्मपत्नी स्वर्गीय मंजू देवी की 19वीं पुण्यतिथि का। अपने बेटे निशांत कुमार के साथ पैतृक गांव कल्याण बिगहा पहुंचे नीतीश कुमार ने स्मृतियों के गलियारे में डूबकर अपनी जीवनसंगिनी को नमन किया। मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देने और संसदीय पारी की नई शुरुआत के बाद अपने गांव का यह उनका पहला दौरा था।

​सुरक्षा के कड़े इंतजाम और समर्थकों का उत्साह

​पूर्व मुख्यमंत्री के आगमन को लेकर जिला प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद था। डीएम कुंदन कुमार और एसपी भारत सोनी ने स्वयं सुरक्षा व्यवस्था की कमान संभाली। पूरे गांव को तोरण द्वारों और फूलों से भव्य रूप से सजाया गया था। जैसे ही नीतीश कुमार का काफिला गांव की सीमा में दाखिल हुआ, ‘नीतीश कुमार जिंदाबाद’ के नारों से आसमान गूंज उठा। समर्थकों का उत्साह यह बताने के लिए काफी था कि पद बदलने के बावजूद अपने नेता के प्रति उनका प्रेम आज भी वैसा ही है।

​श्रद्धांजलि और जनसंवाद

​कार्यक्रम की शुरुआत गांव के कुलदेवी मंदिर में पूजा-अर्चना के साथ हुई। इसके बाद नीतीश कुमार और निशांत कुमार ‘राम लखन सिंह स्मृति वाटिका’ पहुंचे। वहां उन्होंने मंजू देवी की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी। इस मौके पर ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार, सांसद कौशलेंद्र कुमार और कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। हालांकि यह एक निजी दौरा था, लेकिन नीतीश कुमार ने वहां मौजूद फरियादियों की समस्याओं को भी धैर्यपूर्वक सुना और समाधान का भरोसा दिया।

​अनसुनी प्रेम कहानी: त्याग और समर्पण की मिसाल

​नीतीश कुमार और मंजू देवी का रिश्ता केवल पति-पत्नी का नहीं, बल्कि संघर्ष के दिनों की अटूट साझेदारी का था। 1973 में हुई इस शादी की दो शर्तें आज भी समाज के लिए मिसाल हैं पहली ‘दहेज मुक्त विवाह’ और दूसरी ‘पत्नी की पूर्ण सहमति’।
​राजनीतिक गलियारों में चर्चित एक किस्सा आज भी लोगों की आंखें नम कर देता है। जब नीतीश कुमार लगातार चुनावी हार का सामना कर रहे थे, तब मंजू देवी ने अपनी ढाई साल की पूरी बचत (सैलरी) उन्हें चुनाव लड़ने के लिए सौंप दी थी। इसी आर्थिक और मानसिक संबल के दम पर नीतीश कुमार ने अपनी पहली बड़ी चुनावी जीत दर्ज की। वर्ष 2007 में उनके निधन पर कड़क स्वभाव के माने जाने वाले नीतीश कुमार फूट-फूटकर रो पड़े थे, जो उनके गहरे अनुराग को दर्शाता है।
​स्थानीय कार्यकर्ता राजकिशोर सिंह उर्फ ककू ने बताया कि यह दौरा पूरी तरह पारिवारिक था, लेकिन ग्रामीणों का जुड़ाव इसे एक उत्सव जैसा बना देता है।