आशुतोष तिवारी, जगदलपुर। बस्तर के नगरनार और कस्तूरी पंचायत के किसानों का दर्द अब गुस्से में बदलता नजर आ रहा है। किसानों का आरोप है कि एनएमडीसी और औद्योगिक गतिविधियों से निकलने वाला आयरन युक्त काला पानी वर्षों से उनके खेतों में छोड़ा जा रहा है, जिससे 350 एकड़ से ज्यादा कृषि भूमि प्रभावित हो चुकी है। मिट्टी परीक्षण रिपोर्ट सामने आने के बाद किसान अब सीधे सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर उनकी बर्बाद होती खेती और उजड़ते भविष्य की जिम्मेदारी कौन लेगा?
दरअसल जगदलपुर के सहायक मृदा परीक्षण अधिकारी द्वारा जारी रिपोर्ट में कस्तूरी गांव के पांच किसानों के खेतों की मिट्टी की जांच की गई। रिपोर्ट के मुताबिक मिट्टी का pH 6.46 से 6.69 के बीच पाया गया, जो सामान्य श्रेणी में आता है। वहीं EC 0.236 से 0.595 dS/m दर्ज किया गया, जो मानक के अनुसार सुरक्षित सीमा में है, लेकिन रिपोर्ट के आंकड़े यह भी बताते हैं कि कई खेतों में उपलब्ध पोटाश 393 से 551 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक पहुंच गया, जबकि सामान्य उच्च सीमा 280 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर मानी जाती है। लोहे यानी आयरन की मात्रा भी 37 से 71 पीपीएम तक पाई गई, जबकि मानक उच्च सीमा 10 पीपीएम है। तांबा 3.7 से 13 पीपीएम तक दर्ज हुआ, जबकि सामान्य उच्च सीमा 0.50 पीपीएम मानी जाती है।
किसानों का कहना है कि कागजों में आंकड़े चाहे जो कहें, लेकिन जमीन पर सच्चाई बिल्कुल अलग है। जिन खेतों से पहले एक एकड़ में 20 से 22 क्विंटल तक धान की पैदावार होती थी, वहां अब मुश्किल से 3 से 4 क्विंटल धान हो रहा है। किसानों का दावा है कि खेतों की उपजाऊ शक्ति 80 प्रतिशत तक खत्म हो चुकी है। कई परिवार कर्ज के बोझ तले दब गए हैं।


कलेक्टर, विधायक, सांसद को दे चुके हैं आवेदन
किसानों के मुताबिक, नगरनार और कस्तूरी पंचायत के लोग वर्षों से कलेक्टर, विधायक, सांसद और प्रशासनिक अधिकारियों को आवेदन देकर गुहार लगाते रहे हैं कि एनएमडीसी अपने परिसर से निकलने वाले काला पानी को बाहर खेतों में न छोड़ें और उसे अपने क्षेत्र में ही रोकने की व्यवस्था करें, लेकिन किसानों का आरोप है कि उनकी आवाज लगातार अनसुनी की जा रही है।

कलेक्टर ने आश्वासन दिया पर नहीं पहुंचा जांच दल
पिछले सप्ताह बस्तर कलेक्टर आकाश छिकारा किसानों से मिले थे और जांच के लिए टीम गठित करने का आश्वासन दिया था, लेकिन किसानों का कहना है कि 2 जून से 9 जून तक एक सप्ताह से अधिक समय गुजर जाने के बावजूद कोई जांच दल खेतों तक नहीं पहुंचा। इसी वजह से किसानों में भारी आक्रोश है। अब किसानों ने साफ शब्दों में दो विकल्प रख दिए हैं। पहला, आयरन युक्त पानी को पूरी तरह बंद किया जाए और खेतों में उसका प्रवाह रोका जाए। दूसरा, यदि पानी रोकना संभव नहीं है तो प्रभावित जमीनों का अधिग्रहण कर परिवारों को स्थायी रोजगार दिया जाए। किसानों का कहना है कि जिन खेतों की कमाई से पीढ़ियां पली-बढ़ी हैं, यदि वही खेत खत्म हो रहे हैं तो परिवारों के जीवन-यापन की जिम्मेदारी भी सरकार और उद्योग को उठानी चाहिए।

बड़ा सवाल – जांच कब होगी, समाधान कौन निकालेगा?
किसानों का आरोप सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि यही आयरन युक्त पानी खेतों और नालों से बहते हुए अंततः इंद्रावती नदी में पहुंचता है। इंद्रावती ही जगदलपुर शहर के लिए प्रमुख जल स्रोत है। किसानों ने आशंका जताई है कि यदि पानी की गुणवत्ता पर गंभीर जांच नहीं हुई तो इसका असर व्यापक जनस्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है। हालांकि इस संबंध में वैज्ञानिक और स्वास्थ्य विभाग की स्वतंत्र जांच आवश्यक होगी। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर जांच कब होगी और किसानों की इस लड़ाई का समाधान कौन निकालेगा? क्योंकि यहां सिर्फ खेत नहीं, सैकड़ों परिवारों का भविष्य दांव पर लगा हुआ है।

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