He is only exempt from failures who makes no effort…” प्रयास ही सफलता का द्वार है। कोशिश एक उछाला हुआ सिक्का है जिसका हेड और टेल, सामने आने वाली सफलता और असफलता है। जो प्रयास करता है वही कभी असफल होता है और कभी सफ़ल मगर जो प्रयास ही नहीं करता वह न असफल होता है और न ही सफलता का कभी स्वाद ही चख पाता है।असफलता भी क़ीमती है उसका अधिकारी होने के लिए भी प्रयास चाहिए। इस पर एक बहुत ही प्रसिद्ध और प्रेरणादायक शेर है। “गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में,वो तिफ़्ल क्या गिरे जो घुटनों के बल चले।” जीवन युद्ध में वही लोग गिरते या विजयी होते हैं जो जोखिम उठाते हैं।

असफलताओं से मुक्त रहने का सबसे उपयुक्त साधन है कोई प्रयास ही न करना मगर ऐसी मुक्तता को पराजय कहते हैं। प्रयास, साहस का प्रतीक है जो दर्शाता है कि व्यक्ति अपने सपनों को साकार करने के लिए जोखिम उठाने को तैयार है। जिन्होंने भी असफलता को अपना गुरु बना लिया समझो वो सफ़ल हुआ । श्रीमद्भगवद्गीता के एक श्लोक उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥ में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को मन और कर्म का महत्व समझाते हुए कहते हैं कि मनुष्य अपने द्वारा ही अपना उद्धार करे, अपना पतन न करे क्योंकि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु है।”

न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।

यह संस्कृत का एक अत्यंत प्रसिद्ध श्लोक है। इसका अर्थ है कि केवल इच्छा करने से कोई काम पूरा नहीं होता। सोए हुए शेर के मुंह में हिरण स्वमेव प्रवेश नहीं करता शेर को भी अपना पेट भरने के लिए उद्यम (शिकार) करना पड़ता है।

असफलता अंत नहीं एक नई शुरुआत है, एक ऐसा अवसर है जिसमें हम अपनी गलतियों से सीखकर और अधिक मजबूती के साथ आगे बढ़ सकते हैं। असफलता, घबराने के लिए नही बल्कि अपनाने के लिए है। हर प्रयास हमें लक्ष्य के और करीब ले जाता है, याद रखें जो प्रयास नहीं करता वह कभी हारता नहीं लेकिन वह कभी जीतता भी नहीं।

संदीप अखिल

सलाहकार संपादक

न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम