कुंदन कुमार/पटना। आजादी के 78 वर्षों बाद भी देश में लोकतंत्र की मुख्यधारा से वंचित दलित मुसलमानों के मुद्दे पर पटना के आईएमए (IMA) हॉल में एक महत्वपूर्ण प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया गया। इस दौरान अतिपिछड़ा मुस्लिम संगठन ने अपनी उपेक्षा के खिलाफ आवाज बुलंद करते हुए राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग की है।

​40 साल से जारी है सामाजिक न्याय का छलावा

​संगठन के संयोजक नूर हसन आजाद ने सूबे की सरकारों पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि पिछले चार दशकों से राज्य में ‘सामाजिक न्याय’ के नाम पर राजनीति की जा रही है, लेकिन दलित मुसलमानों को आज भी उनके हक से वंचित रखा गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आजादी के इतने वर्षों के बाद भी दलित मुस्लिम समुदाय का कोई भी प्रतिनिधि सदन तक नहीं पहुंच सका है जो भारतीय लोकतंत्र की समावेशिता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

​आरक्षण के लाभ से वंचित हैं दलित मुसलमान

​नूर हसन आजाद ने कर्पूरी ठाकुर द्वारा लागू किए गए आरक्षण फॉर्मूले पर पुनर्विचार की मांग की है। उन्होंने कहा कि वर्तमान व्यवस्था का लाभ केवल ‘अगड़ी’ मानसिकता और वर्ग के मुसलमानों को ही मिल रहा है। जबकि वास्तविक रूप से पिछड़े और दलित मुस्लिम आज भी हासिए पर हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि आरक्षण का लाभ सही लाभार्थियों तक न पहुंचना एक गंभीर विसंगति है, जिसे अब और अधिक सहन नहीं किया जाएगा।

​एनडीए सरकार से विशेष अपील

​प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान संगठन ने एनडीए सरकार से आगामी विधान परिषद (MLC) चुनावों को लेकर ठोस कदम उठाने की अपील की है। संयोजक ने मांग की है कि विधान परिषद की रिक्त सीटों में से कम से कम एक सीट दलित मुस्लिम समाज के किसी प्रतिनिधि को दी जाए। उन्होंने कहा कि यह कदम न केवल सामाजिक न्याय की विचारधारा को वास्तविक धरातल पर मजबूत करेगा, बल्कि समाज के सबसे दबे-कुचले वर्ग को मुख्यधारा में शामिल करने की दिशा में एक ऐतिहासिक निर्णय साबित होगा।
​इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में बड़ी संख्या में समुदाय के लोग शामिल हुए और एक सुर में अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी की पुरजोर मांग उठाई। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस मांग पर क्या प्रतिक्रिया देती है और दलित मुसलमानों के प्रतिनिधित्व को लेकर क्या रुख अपनाती है।