पटना। शहर की सड़कों पर भारतीय जनता पार्टी द्वारा महिला आरक्षण के समर्थन में निकाला गया ‘मशाल जुलूस’ राजनीति और जमीनी हकीकत के बीच के फासले को उजागर कर गया। आयोजन में महिलाओं की संख्या तो भारी दिखी, लेकिन जुलूस का मुख्य उद्देश्य ‘आरक्षण’ कहीं पीछे छूट गया और महिलाओं की बातचीत में ‘महंगाई’ और ‘बेरोजगारी’ जैसे बुनियादी सवाल हावी रहे।
भीड़ का हिस्सा बनीं, पर मुद्दे से अनजान
जांच पड़ताल में यह बात सामने आई कि जुलूस में शामिल कई महिलाओं को यह तक पता नहीं था कि वे किसलिए सड़क पर उतरी हैं। रेणु देवी नामक महिला ने साफ लहजे में कहा, हमें नहीं पता किस मुद्दे पर आए हैं। सब लोग आए तो हम भी आ गए। वहीं, कुछ महिलाएं कैमरे और सवालों से बचती नजर आईं। एक महिला ने तो हंसते हुए यहां तक कह दिया कि वे भाजपा की तरफ से आई हैं, शायद कुछ मांग पूरी हो जाए।
आरक्षण से बड़ा ‘महंगाई’ का मुद्दा
जुलूस में शामिल महिलाओं के लिए राजनीति से ज्यादा बड़ा मुद्दा घर का बजट था। दुलारी देवी ने अपना दर्द साझा करते हुए कहा कि गरीब आदमी के पास खाने-पीने का इंतजाम नहीं है। गैस की कीमतें आसमान छू रही हैं और पटना जैसे शहर में लकड़ी तक मयस्सर नहीं है। उनके लिए सवाल यह था कि आरक्षण से पहले पेट भरने की व्यवस्था कैसे होगी।
नेताओं का दावा बनाम जमीनी सच्चाई
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने जुलूस को महिलाओं के सम्मान और 33% आरक्षण के प्रति केंद्र सरकार की प्रतिबद्धता का प्रतीक बताया। उन्होंने विपक्ष पर इस राह में रोड़ा अटकाने का आरोप लगाया। हालांकि, जुलूस की एकजुटता तब कमजोर दिखी जब खुद प्रदेश अध्यक्ष इनकम टैक्स चौराहे से ही लौट गए। बड़ी संख्या में महिलाएं भी बीच रास्ते से वापस चली गईं, सिर्फ पूर्व मंत्री श्रेयसी सिंह और सांसद धर्मशिला गुप्ता के साथ मुट्ठी भर महिलाएं ही डाक बंगला चौराहे तक पहुंचीं।
राजनीतिक खींचतान और समर्थन
जहां कुछ महिलाएं मुद्दों से अनजान थीं, वहीं दईमंती देवी जैसी कुछ समर्थकों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की नीतियों का बचाव किया। उन्होंने आरक्षण के मुद्दे पर विपक्षी नेताओं के विरोध की निंदा की। इंदु देवी ने कहा कि वे अपनी मांगों को लेकर यहां पहुंची हैं।
यह मशाल जुलूस एक ओर भाजपा के शक्ति प्रदर्शन का हिस्सा बना, तो दूसरी ओर इसने यह गंभीर सवाल भी खड़ा किया कि राजनीतिक आयोजनों में जुटने वाली भीड़ क्या वाकई मुद्दों को समझती है? पटना की सड़कों पर उतरीं इन महिलाओं के बयानों ने साफ कर दिया कि उनके लिए ‘आरक्षण’ की बहस से कहीं अधिक जरूरी ‘महंगाई’ से लड़ना है।
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