​पटना। बिहार की राजधानी स्थित गर्दनीबाग अस्पताल की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर चर्चा में है। अस्पताल परिसर में लाखों रुपये की जीवन रक्षक दवाइयां, पीपीई किट, हैंड ग्लव्स और ग्लूकोज टेस्ट स्ट्रिप्स जैसी महत्वपूर्ण सामग्री कचरे के ढेर और लावारिस हालत में पड़ी मिली हैं। सरकारी उदासीनता का आलम यह है कि जो दवाइयां मरीजों के काम आनी चाहिए थीं, वे अब बरामदों और सीढ़ियों पर धूल फांक रही हैं।

​खुले में पड़ी दवाइयां और धूल का साम्राज्य

​अस्पताल के स्टोर प्रबंधन की भारी चूक सामने आई है। बरामदों और गलियारों में दवाओं के कार्टन इस कदर बिखरे हैं जैसे वे कोई कूड़ा हों। गर्मी, नमी और धूल के सीधे संपर्क में होने के कारण इन दवाओं की गुणवत्ता पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि दवाओं को सुरक्षित वातावरण न मिलने से उनकी रासायनिक संरचना बदल सकती है, जिससे वे मरीजों के लिए बेअसर या हानिकारक साबित हो सकती हैं।

​कोल्ड चेन का बुरा हाल: सामान्य तापमान पर इंसुलिन

​अस्पताल प्रशासन की सबसे घातक लापरवाही तापमान-संवेदनशील दवाओं के रख-रखाव में दिखी है। इंसुलिन और कई महत्वपूर्ण एंटीबायोटिक इंजेक्शन्स, जिन्हें अनिवार्य रूप से 2 से 8 डिग्री सेल्सियस के बीच ‘कोल्ड चेन’ में रखा जाना चाहिए, उन्हें सामान्य तापमान में जमीन पर पटक दिया गया है। बिना रेफ्रिजरेशन के इन जीवन रक्षक दवाओं के निष्क्रिय होने की पूरी आशंका है।

​गोदाम में रैक तक नहीं, WHO के मानकों की अनदेखी

​विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के सख्त दिशा-निर्देशों के बावजूद, अस्पताल के स्टोर रूम में दवाओं को रखने के लिए बुनियादी रैक तक उपलब्ध नहीं हैं। दवाइयों के बॉक्स सीधे जमीन पर रखे गए हैं, जिससे सीलन का खतरा बना हुआ है। न तो यहां नियमित स्टॉक ऑडिट हो रहा है और न ही प्रशिक्षित स्टाफ की तैनाती है। भारी अव्यवस्था के कारण कई दवाइयां अब अपनी एक्सपायरी डेट के करीब पहुंच चुकी हैं, जिससे सरकारी खजाने को लाखों की चपत लगना तय है।

​जांच के घेरे में अस्पताल प्रबंधन

​मामला उजागर होने के बाद स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया है। पटना के सिविल सर्जन डॉ. योगेन्द्र प्रसाद मंडल ने इसे अत्यंत गंभीर मामला बताते हुए जांच के आदेश दिए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया है कि दवाओं के रख-रखाव में कोताही बरतने वाले जिम्मेदार कर्मचारियों और अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
​इस घटना ने एक बार फिर बिहार के सरकारी अस्पतालों में दवा प्रबंधन और प्रशासनिक जवाबदेही पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। जहां एक ओर गरीब मरीज दवाओं के लिए भटक रहे हैं, वहीं दूसरी ओर लाखों की दवाइयां कचरा बनने की कगार पर हैं।