पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (PGIMER) चंडीगढ़ ने बाल स्वास्थ्य सेवा में बड़ी पहल करते हुए देश का पहला तीन वर्षीय पीडियाट्रिक डर्मेटोलॉजी डीएम कोर्स शुरू किया है। इंस्टीट्यूट ऑफ नेशनल इंपोर्टेंस सुपर स्पेशियलिटी (INI-SS) प्रक्रिया के तहत शुरू हुए इस पाठ्यक्रम से बच्चों के त्वचा रोगों के विशेषज्ञों की उपलब्धता बढ़ेगी।
चंडीगढ़। पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (PGIMER) चंडीगढ़ ने चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में नया इतिहास रचते हुए भारत का पहला पीडियाट्रिक डर्मेटोलॉजी (बाल त्वचा रोग) तीन वर्षीय डीएम सुपर स्पेशियलिटी पाठ्यक्रम शुरू किया है। इंस्टीट्यूट ऑफ नेशनल इंपोर्टेंस सुपर स्पेशियलिटी (INI-SS) की प्रवेश प्रणाली के अंतर्गत यह कोर्स संचालित किया जाएगा। संस्थान का उद्देश्य बच्चों में होने वाली गंभीर और जटिल त्वचा संबंधी समस्याओं के उपचार के लिए विशेष चिकित्सकों की नई टीम तैयार करना है।
बाल त्वचा चिकित्सा को नई पहचान
पीजीआई के त्वचा रोग, यौन रोग एवं कुष्ठ रोग विभाग द्वारा शुरू की गई यह पहल देश में पीडियाट्रिक डर्मेटोलॉजी को एक स्वतंत्र और महत्वपूर्ण सुपर स्पेशियलिटी के रूप में स्थापित करेगी। इस कदम से आने वाले समय में छोटे बच्चों के लिए समर्पित और उन्नत त्वचा देखभाल सेवाओं का विस्तार संभव हो सकेगा।
अनुसंधान और बेहतर उपचार पर जोर
इस महत्वपूर्ण उपलब्धि पर विचार व्यक्त करते हुए पीजीआई के निदेशक प्रो. विवेक लाल ने कहा, “यह कार्यक्रम केवल विशेषज्ञ डॉक्टर तैयार करने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि बच्चों की त्वचा संबंधी बीमारियों के बेहतर इलाज, अनुसंधान और विभिन्न विभागों के बीच समन्वय को भी बढ़ावा देगा। इससे देशभर के बच्चों को अधिक गुणवत्तापूर्ण और विशेष चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी।”
गंभीर बीमारियों का विशेष प्रशिक्षण
तीन वर्ष की अवधि वाले इस डीएम पाठ्यक्रम के तहत चिकित्सकों को सोरायसिस, एक्जिमा, अर्टिकेरिया, स्किन इंफेक्शन, पिगमेंटेशन और बालों से जुड़ी आम समस्याओं के इलाज की गहन ट्रेनिंग दी जाएगी। इसके साथ ही विरले आनुवंशिक त्वचा विकारों की सटीक पहचान, आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों और जटिल मामलों के प्रबंधन में भी उन्हें दक्ष बनाया जाएगा।
शोध और वैज्ञानिक देखभाल को बढ़ावा
पीजीआई प्रबंधन के अनुसार, इस नए पाठ्यक्रम से बाल त्वचा रोगों का समय पर निदान और वैज्ञानिक पद्धति से लंबे समय तक चलने वाला इलाज आसान होगा। इसके अलावा जीनोमिक, क्लिनिकल और ट्रांसलेशनल रिसर्च को नया आयाम मिलेगा, जिससे भविष्य में देश के हर हिस्से में बच्चों के लिए विशेष त्वचा चिकित्सा अधिक सुलभ हो सकेगी।


