पटना। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्लोवाकिया यात्रा के दौरान एक बेहद सुखद और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षण देखने को मिला। प्रधानमंत्री ने स्लोवाकिया के संसद अध्यक्ष रिचर्ड राशी को बिहार और झारखंड की पहचान महापर्व छठ का पवित्र प्रसाद ठेकुआ भेंट स्वरूप प्रदान किया। यह न केवल एक उपहार है बल्कि भारतीय संस्कृति और बिहार की समृद्ध विरासत का विश्व पटल पर एक गौरवशाली संदेश भी है।
सांस्कृतिक राजदूत बना ठेकुआ
दीघा के विधायक डॉ. संजीव चौरसिया ने इस पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए सोशल मीडिया पर लिखा कि प्रधानमंत्री द्वारा वैश्विक मंच पर इस प्रसाद को भेंट करना, भारतीय आस्था और संस्कृति के वैश्विक विस्तार का प्रतीक है। ठेकुआ केवल एक पारंपरिक मीठा नाश्ता नहीं है, बल्कि यह उन करोड़ों लोगों की भावनाओं से जुड़ा है, जो छठ पूजा के दौरान इसके बिना अनुष्ठान को अधूरा मानते हैं।

प्राचीन इतिहास और ठेकुआ
ठेकुआ का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसका उल्लेख लगभग 3700 साल पुराने ऋग्वैदिक काल में मिलता है। उस समय इसे ‘अपूप’ के नाम से जाना जाता था, जो गेहूं के आटे, गुड़, दूध और घी के मिश्रण से तैयार एक पौष्टिक पकवान था। मान्यता है कि तभी से भगवान सूर्य की उपासना में इसे भोग के रूप में शामिल किया गया।
इतना ही नहीं, बौद्ध ग्रंथों (विनय पिटक) के अनुसार, जब भगवान बुद्ध ने बोधिवृक्ष के नीचे 49 दिनों का कठिन उपवास रखा था, तब दो व्यापारियों, तापस सु और भल्लिका ने उन्हें आटा, गुड़ और मधु से निर्मित इसी ठेकुआ सदृश पकवान का भोग लगाकर उनका उपवास तुड़वाया था।

स्वाद और विरासत का मेल
शुद्ध घी, गेहूं के आटे और गुड़ के तालमेल से बना ठेकुआ अपनी सादगी और लंबे समय तक सुरक्षित रहने की क्षमता के लिए प्रसिद्ध है। दशकों पहले तक, यह प्रसाद केवल स्थानीय स्तर पर रिश्तेदारों के बीच बांटा जाता था, लेकिन आज यह अपनी लोकप्रियता के कारण देश-विदेश में बसे प्रवासियों के लिए ‘घर के स्वाद’ की सौगात बन चुका है। लोग इसे कुरियर के माध्यम से दुनिया के कोने-कोने तक भेजते हैं।
ठेकुआ का वैश्विक मंच पर पहुंचना इस बात का प्रमाण है कि भारत की सांस्कृतिक जड़ें कितनी गहरी हैं। यह सादगी और परंपरा का ऐसा मेल है, जो समय के साथ और भी अधिक प्रिय होता जा रहा है।

