
Column By- Ashish Tiwari, Resident Editor Contact no : 9425525128
सेलिब्रिटी पॉलिटिशियन
प्रदेश प्रभारी स्मृति ईरानी अपना सियासी स्टेथोस्कोप लेकर पहली बार छत्तीसगढ़ आई हैं। मैराथन बैठकों की ओपीडी सजने वाली है, जहां सबसे पहले संगठन की नब्ज चेक होगी कि आगामी चुनाव के नाम से धड़कनें तेज हैं या सिस्टम वेंटिलेटर पर है। अगर नब्ज में जरा भी ऊंच-नीच दिखी, तो दिल्ली से लाया गया स्पेशल डोज़ तुरंत लगाया जाएगा। संगठन की फिटनेस रिपोर्ट के बाद बारी आएगी सत्ता के वीआईपी वॉर्ड की। यहां यह अल्ट्रासाउंड होगा कि कौन सा मंत्री किस हवा में उड़ रहा है? किस मंत्री के पर कितने निकल आए हैं और कौन बिना रनवे के ही टेक-ऑफ कर चुका है? वैसे सच तो यह है कि ईरानी साहिबा ने दिल्ली में ही पूरी मेडिकल हिस्ट्री खंगाल ली है। अब बस सियासी सर्जरी करना और कड़वी दवा पिलाना बाकी है। सत्ता के गलियारों में चर्चा जोरों पर है कि अब राज्य का पूरा पावर सेंटर इसी सेलिब्रिटी पॉलिटिशियन की परिक्रमा करेगा। कुल मिलाकर स्मृति ईरानी को यहां भेजना कोई रूटीन चेकअप नहीं है, बल्कि एक ब्लॉकबस्टर सियासी ड्रामे का ट्रेलर भर है।
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परफॉर्मेंस ऑडिट
स्मृति ईरानी का सूबे में दौरा महज एक राजनीतिक प्रवास भर नहीं है, बल्कि उनका यह दौरा किसी पॉलिटिकल कोर्ट मार्शल की मुनादी की तरह गूंज रहा है। स्मृति ईरानी के दौरे की वजह से अचानक मंत्रियों का जो ब्लड प्रेशर उछाल मार रहा है, वह उस खौफ की देन है जो एक बंद फाइल में दिल्ली से सफर कर रहा है। इसे परफॉर्मेंस ऑडिट रिपोर्ट कहते हैं। दरअसल यह रिपोर्ट एक ऐसा बेरहम आईना है, जिससे सूबे के माननीयों को अपना असली अक्स दिखने का खौफ सता रहा है, जिसे वे अब तक सत्ता के गुरूर तले छिपाते आए हैं। सूबे के लोग तो इन सफेदपोशों की कार्यकुशलता और हर फाइल की रेट लिस्ट से बखूबी वाकिफ है, लेकिन दिल्ली का मिजाज अलग है। वहां केंद्रीय एजेंसियों के वे खामोश डोजियर बोलते हैं, जो हर मंत्री की कमाई और कारनामों का पल-पल का हिसाब रखते हैं। खबर है कि बिना किसी शोर के तैयार की गई वह रिपोर्ट अब स्मृति ईरानी के हाथों में है और इस रिपोर्ट ने ही कई दिग्गजों की रातों की नींद लील ली है। मंत्रियों की सबसे बड़ी बेचैनी इस बात को लेकर है कि इस बार ऑडिट करने वाला कोई ऐसा पारंपरिक प्रभारी नहीं है जिसे वीआईपी ट्रीटमेंट, शाम की दावतों या चाटुकारिता से मैनेज किया जा सके। सूबे के सियासी मठाधीश यह कड़वा सच जानते हैं कि जिसकी सीधी पहुंच नंबर वन, नंबर टू और राष्ट्रीय अध्यक्ष तक हो, उसके सामने कोई भी सियासी जुगाड़ या लॉबिंग सिर्फ एक भद्दा मज़ाक है। वहां ना तो कोई सिफारिश काम आनी है और ना ही कोई रसूख। हालात ये हैं कि जो मंत्री कल तक अपने विभागों में शहंशाह बने बैठे थे, आज वे अपनी ही परछाईं से जवाब-तलब कर रहे हैं। अब बस इस बात का इंतज़ार है कि दिल्ली की इस खामोश सर्जिकल स्ट्राइक में कितने दिन बाकी हैं।
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बवाल क्यों?
विजयादशमी पर शस्त्र पूजा हमारी एक प्राचीन परंपरा है, लेकिन इस बार यह अचानक सुरक्षा का बड़ा मुद्दा बन गई। वजह सिर्फ इतनी थी कि एके 47 का ट्रिगर एक महिला आईपीएस अफसर अंकिता शर्मा के हाथों में था। रातों रात सोशल मीडिया के डिजिटल दरोगा हथियारों के विशेषज्ञ बन बैठे। विडंबना देखिए कि जिन लोगों ने जीवन में कभी मेले में छर्रे वाली बंदूक से गुब्बारे तक नहीं फोड़े, वे लोग राष्ट्रीय पुलिस अकादमी की कठोर ट्रेनिंग से गुजरी एक आईपीएस अफसर को एके 47 का सेफ्टी कैच और फायरिंग के नियम समझा रहे हैं। असल में दिक्कत एके 47 के ट्रिगर से नहीं है। दिक्कत समाज की दोहरी मानसिकता से है। अगर यही फायरिंग किसी मूंछों वाले सिंघम अफसर ने की होती, तो अब तक भौकाल वाले गानों के साथ उस पर हजारों रील्स बन चुकी होती, लेकिन जैसे ही बात एक महिला अफसर की आई, कथित शूरवीरों को फौरन पुलिस मैनुअल याद आ गया। ट्रोलर्स को अपनी इस वर्चुअल चिंता पर भी सेफ्टी कैच लगाकर रखना चाहिए, क्योंकि जो हाथ असल मोर्चे पर हथियार और चुनौतियां दोनों संभालना जानते हो, उन्हें किसी डिजिटल सर्टिफिकेट की कोई दरकार नहीं होती। अब लाख टके का सवाल यह है कि आखिर इतना बवाल क्यों मचा? इसका जवाब सरकार को जरूर ढूंढना चाहिए।
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अड़ियल अफसर
हमारे सिस्टम की सबसे खूबसूरत बात यह है कि यहां का हर अफसर तब तक ईमानदार है, जब तक कि वह खुद मंच से अपनी ईमानदारी के कसीदे पढ़ता रहता है। बाकी यह बात हर कोई जानता है कि सरकारी व्यवस्था के हमाम में सब के सब नंगे हैं। सरकारी व्यवस्था के भीतर की हलचल भी सीधे चौक-चौराहों पर दस्तक दे जाती है। सो इस व्यवस्था के कथित ईमानदार चेहरे चोंगा पहने ज्यादा दिनों तक टिके नहीं रह सकते, लेकिन इसी सिस्टम के सुविधाजनक और एडजस्टिंग गलियारों में कुछ ऐसी मुसीबतें भी हैं, जिन्हें पचाना आसान नहीं होता। पुलिस महकमे के एक बड़े अफसर कहते हैं कि आईपीएस अंकिता शर्मा एक ऐसी ही समस्या हैं। अब इसे उनकी जिद कहिए या आदत, लेकिन उन्होंने सिस्टम के स्थापित ढर्रे को ताक पर रखकर एक दबंग और बेदाग अफसर होने की जिद पाल रखी है। पुलिस महकमे के बड़े-बड़े धुरंधर भी जब उनके बारे में बात करते हैं, तो दबी जुबान में यही शिकायत करते हैं कि मैडम थोड़ी ज्यादा ही तेज हैं। और हो भी क्यों ना? रूल्स और रेगुलेशन नाम की जिस किताब को ज्यादातर अफसर जहां सिर्फ टेबल की सजावट के लिए इस्तेमाल करते हैं, अंकिता शर्मा उस किताब में लिखे अक्षरों के आगे किसी रसूखदार नेता या बाहुबली की एक नहीं सुनतीं। सिस्टम को इस बात से कोई खास ऐतराज नहीं है कि वह कड़क हैं, लेकिन असली परेशानी यह है कि तमाम कोशिशों और खुर्दबीनों के बाद भी उनके नाम पर बेईमानी का एक मामूली सा भी धब्बा नहीं ढूंढा जा सका। बेदाग वर्दी पहनकर घूमना सिस्टम के स्थापित हमाम के नियमों का सरासर उल्लंघन तो है ही। सूबे के एक आला अफसर ने मौजूदा प्रसंग के बाद बने या बनाए गए घटनाक्रमों के संदर्भ में टिप्पणी करते हुए कहा कि व्यवस्था की असली इज्जत इन्हीं गिने चुने अड़ियल और ईमानदार अफसरों के इकबाल के दम पर बची हुई है।
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दो मिनट का मौन
न्याय के इस महान उत्सव में आपका स्वागत है, जहां एक 17 वर्षीय बेटी की मौत से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि पुलिस ने फाइल में बयान दर्ज करने का समय क्यों नहीं लिखा। हमारी न्याय व्यवस्था की ऐसी अद्भुत कागजी कार्यकुशलता पर तो तालियां बजनी चाहिए! एक तरफ हमारी होनहार पुलिस है, जो संगीन अपराधों की विवेचना करते समय घड़ी देखना भूल जाती है। इसे महज़ एक प्रक्रियागत चूक कहना पुलिसिया प्रतिभा का अपमान होगा, यह तो वह जादुई चाबी है जो तकनीकी आधार पर आरोपियों के लिए जेल का ताला बाहर से खोल देती है। दूसरी तरफ वह व्यवस्था है, जिसके लिए मामले की गंभीरता, गवाहों की सुरक्षा और न्याय से ज्यादा एक कागज की पूर्णता मायने रखती है। नतीजा- रिमांड खारिज! क्योंकि बिना सही टाइमस्टैम्प के न्याय का पहिया कैसे घूमेगा? इस पूरे मामले में प्रशासनिक दौड़ भाग का क्लाइमैक्स भी कम दिलचस्प नहीं है। जिले के आला अधिकारी बॉलीवुड फिल्म के उस पुलिसवाले की तरह आखिरी सीन में हांफते हुए पहुंचते हैं, जब तक कि कोर्ट का द एंड आ चुका होता है। अब स्थिति यह है कि आरोपी आजाद हैं और पीड़ित परिवार न्याय की गुहार लगाते हुए धमकियां झेल रहा है। अगर इस बीच गवाह मुकर जाए, सबूत मिट जाएं या आरोपी रातों रात गायब हो जाए, तो चिंता की कोई बात नहीं। आखिर हम एक ऐसे शानदार ढांचे का हिस्सा हैं, जहां कागजी खानापूर्ति पूरी होने तक जान जाने का भी धैर्यपूर्वक इंतजार कर सकते हैं। अंधा कानून सिर्फ इसलिए अंधा नहीं है कि उसे निष्पक्ष रहना है, बल्कि इसलिए है ताकि उसे फाइल के पन्नों के बाहर का खौफनाक सच न देखना पड़े। किसी की मौत पर सवाल उठाने से पहले, आइए पुलिस की डायरी के उस खाली रह गए कॉलम पर दो मिनट का मौन रख ले।
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