
Column By- Ashish Tiwari, Resident Editor Contact no : 9425525128
अंदाज
सत्ताधारी दल के नेताओं की रोजमर्रा की दखलंदाजी और वक्त की बर्बादी से बचने के लिए एक कलेक्टर ने बड़ा ही नायाब और अचूक नुस्खा ईजाद किया है. जैसे ही कोई नेता उनके दफ़्तर में धमकता है, कलेक्टर साहब शिष्टाचार का ऐसा दांव चलते हैं कि सामने वाला बिना कुछ कहे ही मात खा जाए. वे अपनी कुर्सी छोड़कर सम्मान में खड़े हो जाते हैं. अब जब जिले का सबसे बड़ा अफसर खुद ही खड़ा हो, तो नेताजी किस मुंह से कुर्सी पर पसरें? मजबूरन उन्हें भी खड़े रहना पड़ता है. अपनी टांगों को ज़्यादा कष्ट न देना पड़े, इसलिए नेताजी भी खड़े-खड़े पांच-दस मिनट में अपना मार्गदर्शन या ठेके की पैरवी निपटाकर उल्टे पांव खिसक लेते हैं. इस कूटनीतिक तरकीब से बिना किसी को अपमानित किए कलेक्टर साहब रोज़ाना अपना घंटों कीमती समय बेवजह जाया होने से बचा लेते हैं. कलेक्टर के इस नुस्खे से दफ्तर में बेवजह डेरा डालने और रौब जमाने वाले नेताओं की भीड़ अब खुद ब खुद सिमट गई है. इन सबसे अलग कलेक्टर साहब का अपना एक देसी और बेपरवाह स्वैग भी है. अफसरशाही के चिर परिचित कड़क सूट-बूट और तामझाम से कोसों दूर ढीली-ढाली शर्ट, पैंट और पैरों में साधारण चप्पल डाले कलेक्टर साहब इसी वेशभूषा में पूरा जिला नाप देते हैं. हालांकि उनकी इस दिलचस्प शख्सियत को लेकर लोगों के जेहन में अक्सर एक कौतूहल रहता है. दरअसल काम के बीच-बीच में अचानक वे शून्य में ताकने लगते हैं, जैसे उनका दिमाग स्विच ऑफ हो गया हो. वे ख्यालों में ऐसे खो जाते हैं, मानो दफ्तर में बैठे-बैठे किसी परलौकिक दुनिया की यात्रा पर निकल गए हो. उनकी अचूक कूटनीति और रहस्यमयी कार्यशैली पूरे जिले में चर्चा का विषय बन गई है.
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हिदायत
सत्ता के गलियारों में इन दिनों अफसरशाही का आलम कुछ यूं है कि बड़े-बड़े फरमान जारी हो जाते हैं और विभागीय मंत्री को कानों-कान खबर तक नहीं होती. ताज़ा मामला सूबे के स्कूलों में शाला पालक समिति के गठन से जुड़ा है. पिछले दिनों जब यह मामला सूबे के सबसे बड़े साहब की मेज तक पहुंचा, तो उन्होंने इसका सियासी गणित भांपते हुए सीधे मंत्री जी से पूछ लिया क्या आपको इस फैसले की कोई जानकारी है? इधर साहब का सवाल सुनते ही मंत्री जी हक्के-बक्के रह गए. उन्होंने ऐसे किसी भी आदेश से साफ इनकार कर दिया. पहली नजर में तो मंत्री जी को भी यही लगा कि जरूर किसी ने फर्जी लेटर वायरल कर दिया है, लेकिन जब विभागीय फाइलों की धूल झाड़ी गई तो पता चला कि आदेश तो सौ टका असली है. इसके बाद से अब तक मंत्री जी इसी सोच में गुम हैं कि वे विभाग चला रहे हैं या अफसर उन्हें चला रहे हैं. बहरहाल आलाकमान ने इस वाकये को बेहद गंभीरता से लिया है. सुना है कि कुछ अफसरों को हिदायत देकर यह कहा गया है कि सियासी फैसलों में ब्यूरोक्रेसी का यह ओवरटेक कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.
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कवच कुंडल
सिस्टम में अगर मंत्री जी के पिताजी का कवच कुंडल मिल जाए, तो भ्रष्टाचार भी प्रमोशन की सीढ़ी बन जाता है. पढ़ने लिखने वाले एक महकमे में काम करने वाले साहब का कमाल देखिए, 2020 में सरकारी राशि हड़पने के मामले में एफआईआर का निर्देश था, जो हवा हो गया. 2025 में पेंशन मामलों में लापरवाही के चलते सस्पेंड हुए, तो विभागीय जांच के बीच ही अपनी गोपनीय रिपोर्ट में ऐसा जादुई मेकअप किया कि इनाम के तौर पर बड़ा पद हथिया लिया. नई कुर्सी पाते ही साहब ने 4.5 करोड़ की अनियमितताओं का नया कीर्तिमान रच दिया. जब जांच रिपोर्ट शासन तक पहुंची, तो रसूख का जादू फिर चला. ना कोई एफआईआर हुई और ना ही करोड़ों की वसूली. सिस्टम ने कड़ी सजा का दिखावा करते हुए साहब को वापस मूल पद पर भेज दिया. फिलहाल एक तस्वीर वायरल हो रही है, जिसमे अफ़सर मंत्री जी के पिता की गोद में शरण लिए दिखाई दे रहे हैं. करोड़ों डकारने के बाद अब अफसर जहां भेजे गए हैं, वहां नैतिकता का पाठ पढ़ायेंगे.
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दंगल
सरकार के गलियारों में इन दिनों एक अजीब सी रहस्यमयी खामोशी पसरी है, जिसके पीछे गहरा असंतोष सुलग रहा है. सत्ता और संगठन के भीतर हालात यह है कि नेताओं की दूसरे से पट नहीं रही है. एक मंत्री, दूसरे मंत्री से उलझा है. मंत्री विधायक को गरिया रहा है, तो विधायक मंत्री को. सांसद-विधायकों के बीच आलम यह है कि बस जूतमपैजार बाकी रह गया है. एक-दूसरे को देखकर मुंह फेर लेना बड़ा आम हो चला है. आपसी कड़वाहट इस कदर हावी है कि सरकारी कार्यक्रमों में लोग अब मंच साझा करने से भी कतराने लगे हैं. अगर गलती से मंच साझा हो भी जाए को एक पूरब देखता है, तो दूसरा पश्चिम. बड़ी भयंकर कड़वाहट नेताओं के बीच घुली दिख रही है. मतलब सबका साथ-सबका विकास का नारा भले ही पार्टी ने दिया हो, लेकिन पार्टी के भीतर सबका साथ-सबका विनाश का नारा गूंज रहा है. भाजपा में गुटबाजी और आपसी खींचतान का ऐसा खुला प्रदर्शन पहले कभी नहीं देखा गया. एक दौर वह भी था जब सूबे में रमन सिंह की सरकार थी, तब भी आला नेताओं के बीच मतभेद की खबरें सुर्खियां बनती थी, लेकिन मजाल है कि किसी ने सार्वजनिक मंचों पर शिष्टाचार और सम्मान की रेखा लांघी हो. उस वक्त जब भी पार्टी या सरकार पर कोई राजनीतिक हमला होता था, तो यही नेता सारे गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे की ढाल बन जाते थे, लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं. यह एक बदली हुई भाजपा है, जिसके भीतर अब सिर्फ सियासी दंगल सजा है. एक ऐसा दंगल, जिसमें हर नेता अपने ही साथियों की टांग खींचकर उसे पछाड़ने की होड़ में लगा हुआ है.
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स्मृति लोप
सूबे के नेताओं के बीच चरम पर पहुंच चुकी गुटबाजी की आंच अब दिल्ली दरबार तक जा पहुंची है, जिससे आलाकमान की बेचैनी साफ नजर आ रही है. पिछले दिनों दिल्ली में प्रभारियों और सह प्रभारियों की एक अहम बैठक बुलाई गई. इस बैठक में हाईकमान ने दो टूक फरमान सुना दिया है कि सरकार और संगठन को वापस पटरी पर लाने के लिए चाहे जितनी सख्ती बरतनी पड़े, जरा भी संकोच न किया जाए. दिल्ली से मिले इस कड़े निर्देश के बाद मध्य प्रदेश के प्रभारी बिप्लब देब जब अपने पहले ही दौरे पर पहुंचे, तो उन्होंने अपने तल्ख तेवरों से सबको रूबरू करा दिया. मध्यप्रदेश के नेताओं को साफ अल्टीमेटम दे दिया गया है. या तो अपनी गुटबाजी खत्म करो या फिर अपना बोरिया-बिस्तर समेट लो. सत्ता के इस खेल में अपना बोरिया बिस्तर भला कौन समेटना चाहेगा? मध्य प्रदेश के नेता वैसे भी सियासी दांव-पेच और पैंतरेबाजी के पक्के खिलाड़ी हैं, सो अल्टीमेटम मिलते ही नेताओं के बीच गलबहियां और बनावटी प्रेम उमड़ता दिखाई देने लगा है. इधर सूबे में स्मृति ईरानी का दौरा होना अभी बाकी है. नितिन नबीन प्रभारी रह चुके हैं, सो हर नेता की सियासी कुंडली उनके पास पहले से मौजूद है. ऐसे में जाहिर है कि स्मृति ईरानी पूरी तैयारी और तगड़े होमवर्क के साथ ही मैदान में उतरेंगी. यह देखना बड़ा दिलचस्प होगा कि उनके आने के बाद नेताओं के मन में घर कर चुकी भयंकर गुटबाजी का वाकई स्मृति-लोप होगा या फिर यह दंगल यूं ही चलता रहता है.
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