
स्टार्ट अप
सरकारी महकमों में टेंडर और कमीशन की एक पुरानी रवायत रही है। किस कुर्सी का कितना प्रतिशत होगा यह सब किसी अलिखित संविधान की तरह पहले से तय होता था। ठेकेदार भी खुश और नेता-अफसर भी गदगद। एक हाथ से अटैची जाती थी, दूसरे हाथ से वर्क ऑर्डर आ जाता था, लेकिन कहते हैं ना कि ठहरा हुआ पानी और ठहरी हुई व्यवस्था दोनों सड़ जाती है। इसलिए हमारी व्यवस्था ने खुद को अपग्रेड कर लिया है। अब जमाना स्टार्टअप्स का है, सो हमारे अफसर सोच रहे हैं कि हम भला पीछे क्यों रहे? उन्होंने समझ लिया है कि वन टाइम सेटलमेंट या कमीशन तो दिहाड़ी मजदूरों वाला काम है। असली फायदा को-फाउंडर बनने में है। नकद नारायण का जोखिम कौन ले? जांच एजेंसियों की नजरों से बचने का सबसे शानदार तरीका है-सीधी हिस्सेदारी। पिछले दिनों शहर की एक नामी कॉफी शॉप में एस्प्रेसो की कड़वी चुस्कियों के बीच पुराने घाघ ठेकेदारों ने कड़वी सच्चाई का जिक्र छेड़ दिया। माजरा पूछा तो पता चला कि एक महकमे के बड़े साहब ने टेंडर पास करने का नया फॉर्मूला ईजाद कर लिया है। अब उन्हें 10-15 टके का वन टाइम कमीशन नहीं चाहिए। उन्होंने टेंडर हासिल करने वाले ठेकेदार को बुलाकर कहा- देखो भाई काम तो आपको ही मिलेगा, अगर आप मेरे रिश्तेदार को अपनी फर्म में पार्टनर बना लें ! यह सुनते ही ठेकेदार के माथे पर बल पड़ गया। पहले तो गुपचुप तरीके से सिर्फ मुनाफा बंटता था, अब तो फर्म के बैलेंस शीट पर साहब की अनाधिकृत एंट्री हो रही थी। कॉफी शॉप में उड़ी यह चर्चा अब पूरे ठेकेदारों की बिरादरी में आग की तरह फैल गई है। लगता है कि अब वह दिन दूर नहीं जब टेंडर की शर्तों में ही स्पष्ट लिखा जाएगा कि वही ठेकेदार टेंडर भरने के पात्र होंगे जो विभाग के किसी राजपत्रित अधिकारी के भाई, साले, जीजा या भतीजे को अपनी कंपनी का डायरेक्टर बनाने का लिखित शपथ-पत्र देंगे।
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घाघ नेता-अफसर
वैसे यकीन मानिए तो किसी खास टेंडर में या फर्म में हिस्सेदारी मांगने की यह रवायत बहुत पुरानी भी नहीं है। सूबे में मंत्री और अफसर रह चुके ऐसे कई घाघ चेहरे मौजूद हैं, जिनकी इस किस्म की अघोषित हिस्सेदारी से उनकी आने वाली कई पुश्तें बिना कुछ किए बैठकर खाएंगी। जब यह राज्य नया-नया बना था, तब यहां कई नए उद्योग स्थापित हुए। उद्योगों के आने से विकास की संभावनाएं तो बनीं, लेकिन इन्हीं संभावनाओं ने नेताओं और अफसरों के लिए मुनाफे में सीधी हिस्सेदारी के दरवाजे भी खोल दिए। आज भी अगर खंगाला जाए, तो कई पूर्व मंत्रियों और नौकरशाहों की विभिन्न उद्योगों में दो-पांच प्रतिशत की अघोषित हिस्सेदारी आसानी से सामने आ जाएगी। ढाई साल पहले सूबे में जब सत्ता परिवर्तन हुआ और एक बड़े औद्योगिक घराने पर एक जांच एजेंसी का छापा पड़ा, तब यह चर्चा जोरों पर उठी कि इस उद्योग में एक रसूखदार और सीनियर मंत्री की भी अघोषित हिस्सेदारी है। यह खबर राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में जंगल की आग की तरह फैल गई। दिलचस्प बात यह रही कि यह सुगबुगाहट सच भी साबित हुई और उस उद्योग के ठिकानों पर कार्रवाई करने पहुंची टीमें धीरे-धीरे बिना कोई ठोस कदम उठाए बैरंग लौटती नजर आईं। खैर, हिस्सेदार बनने का यह फॉर्मूला अब अपने चरम पर है। पहले महज इक्का-दुक्का शातिर नेता और अफसर ही इस खेल में माहिर होते थे, लेकिन अब तो कईयों का दिमाग इसी दिशा में सरपट दौड़ रहा है।
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प्राइस टैग
जब मंत्रियों की कानाफूसी तक की निगरानी सीधे दिल्ली के राडार पर हो तब महंगे शौक का सार्वजनिक प्रदर्शन किसी दुस्साहस से कम नहीं है। सूबे के एक मंत्री का लग्जरी शौक खूब सुर्खियां बटोर रहा है। महंगे शौक पर निगाहें तेज हो गई हैं। अब आलाकमान इस पर आंखें तरेरेगा या नजरअंदाज कर देगा फिलहाल यह कोई नहीं जानता। मसला यह है कि मंत्री जी पर शॉपिंग का बुखार इस कदर हावी है कि समय-बेसमय उनका दिल्ली दौरा बन जाता है। कई बार गुपचुप तरीके से दिल्ली की सैर हो जाती है, क्योंकि सूबे में रहकर शॉपिंग करने का सीधा मतलब है सियासी चर्चाओं का तापमान बढ़ा देना। हाल ही में दिल्ली से लौटते वक्त उनके कंधे पर एक लग्जरी ब्रांड का चमचमाता बैग टंगा दिखाई पड़ा। ब्रांड की खुमारी मंत्री जी के सिर ऐसी चढ़ी थी कि बैग से प्राइस टैग हटाना ध्यान ही नहीं रहा। इधर लग्जरी ब्रांड्स पर पीएचडी करने वालों की नजर बैग पर लटकते प्राइस टैग पर ठहर गई। जब लोगों ने प्राइस टैग को जूम किया गया तब मालूम चला कि बैग की कीमत लाखों में है। इस खुलासे के बाद चर्चा सीधे मंत्री जी की पृष्ठभूमि पर जा ठहरी। यह वही मंत्री हैं, जिन्होंने कभी तंग जेब और बिना किसी मजबूत आर्थिक आधार के चुनाव लड़ा था। तब ले-देकर जैसे-तैसे राजनीति चल रही थी, लेकिन मंत्री पद मिलते ही रुपयों की ऐसी बारिश हुई कि रसूख के साथ-साथ उनमें लग्जरी ब्रांड्स की समझ भी रातों रात पैदा हो गई। उनके मंत्री बनने के कुछ महीने बाद ही ठंड भरी एक शाम उनके कंधों पर लाखों की कीमत वाला अंतरराष्ट्रीय ब्रांड बरबरी का शॉल लहराता दिखा था। माना कि मंत्रियों की तनख्वाह ठीक-ठाक होती है और कोई यह नहीं कह रहा कि उनकी हैसियत लग्जरी ब्रांड्स खरीदने की नहीं है, लेकिन राजनीति में जब सिर पर खर्चों का अतिरिक्त बोझ लदा हो तब तनख्वाह के पैसे भी कम पड़ ही जाते हैं और नेताओं को उनके निजी शौक पूरे करने के लिए कोई चंदा तो देने से रहा। वैसे सत्ता के इन किरदारों को इस बात का एहसास होना चाहिए कि सियासत की उम्र तय करने का अब एक ही पैमाना रह गया है और वह है- जमीन पर बने रहना। जो नेता जितना जमीन से जुड़ा होगा, उसका कद उतना ही ऊंचा होगा। बहरहाल नेताओं में लग्जरी ब्रांड्स को लेकर यह रुझान कोई नई बात नहीं है। लुई विटॉन के मफलर से लेकर गिवेंची के जूते पहनकर गरीब तबके की आवाज बनने का ढोंग करते नेताओं के अनगिनत किस्से मशहूर रहे हैं।
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कबाड़
सरकारी तंत्र का अटल नियम है – कोई योजना अगर बिना कमीशन और महंगे कंसल्टेंट के अपने पैरों पर खड़ी हो जाए, तो उसे तत्काल वेंटिलेटर पर डाल दो। 2012 में जेएनएनयूआरएस के तहत शुरू हुए रायपुर सिटी बस प्रोजेक्ट ने ठीक यही गुस्ताखी की थी। स्थानीय स्तर पर बिना किसी कंसल्टेंट के ऐसा सस्टेनेबल मॉडल बुना गया कि 100 बसें न सिर्फ 14 साल तक सड़कों पर दौड़ती रही, बल्कि 2019-20 तक इस व्यवस्था ने 7 करोड़ रुपये का मुनाफा भी कमा लिया। यह उस दौर में हुआ जब प्रदेश के अन्य शहरों में खरीदी गई बसें चंद सालों में ही कबाड़ होकर नीलाम हो रही थीं, लेकिन यही सफलता इस प्रोजेक्ट के गले की फांस बन गई। लालफीताशाही को यह रास कैसे आता कि कोई पुरानी योजना अपने ही कमाए पैसों से नई बसें खरीद ले? अगर ऐसा होता तो करोड़ों के नए टेंडर निकालने का मौका कैसे मिलता? नतीजतन इस आत्मनिर्भर मॉडल को बड़ी ही चालाकी से उपेक्षा की मौत मरने के लिए छोड़ दिया गया। ना नए स्टॉप बने, ना आधुनिकीकरण हुआ और न ही उपलब्ध वित्तीय संसाधनों का उपयोग नई बसें खरीदने की मूल सोच के अनुरूप किया गया। आज जब बदहाल परिवहन व्यवस्था को लेकर एक बार फिर घड़ियाली आंसू बहाए जा रहे हैं और नई बसें खरीदने के नाम पर करोड़ों फूंकने की तैयारी है, तो यह समझ लेना चाहिए कि असली समाधान इसमें नहीं है। वक़्त की मांग है कि 2012 के उस सफल परिवहन मॉडल का गहन वित्तीय और परिचालन ऑडिट कराया जाए। यह एक गंभीर जांच का विषय है कि उस दौर का 7 करोड़ का मुनाफा आखिर गया कहां? और एक आत्मनिर्भर व्यवस्था को कबाड़ में तब्दील कर देने की यह सुनियोजित साजिश किन सफेदपोशों के इशारे पर रची गई!
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लूट
डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन वह तिजोरी है, जो उन जिंदगियों की कीमत पर भरी जाती है जिनका जल, जंगल और जमीन खदानों ने लील लिया है। हाल ही में ओडिशा विधानसभा में पेश हुई सीएजी की रिपोर्ट ने प्रशासनिक व्यवस्था की एक बेहद क्रूर तस्वीर पेश की है। ओडिशा में डीएमएफ के पैसे से इंटरनेशनल हॉकी स्टेडियम और कलेक्टर बंगला बना। पुलिस के लिए करोड़ों रुपए की गाड़ियां भी खरीद ली गई। अगर आपको लगता है कि हाशिए पर खड़े लोगों के साथ यह त्रासदी केवल ओडिशा तक सीमित है, तो जुलाई महीने में छत्तीसगढ़ विधानसभा में पेश हुई सीएजी की रिपोर्ट प्रशासनिक संवेदनहीनता का इससे भी स्याह अध्याय खोलती है। सीएजी की रिपोर्ट बताती है कि छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक बिरादरी ने राज्य में खनन प्रभावित लोगों की मूल परिभाषा को ही अपनी सुविधानुसार बदल दिया। इस एक बदलाव ने उन असली पीड़ितों के वजूद की ही हत्या कर दी, जो विस्थापन का असली दंश झेल रहे थे। सीएजी की रिपोर्ट कहती है कि इसी कागजी बाजीगरी की आड़ में 709 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि ऐसे बांटी गई, जैसे किसी सामंती रियासत में राजा आंख पर पट्टी बांधकर अपनों पर ही खैरात लुटा रहा हो। सीएजी की रिपोर्ट चीख-चीख कर बताती है कि 44 फीसदी वे गांव, जो सीधे खदानों के मुहाने पर मौत झेल रहे हैं, उन तक एक फूटी कौड़ी नहीं पहुंची। दूसरी तरफ 30 करोड़ रुपयों से कलेक्ट्रेट परिसर में आलीशान बगीचे और भव्य स्वागत द्वार बना दिए गए। शायद जब कोई उजड़ा हुआ आदिवासी अपने हक की भीख मांगने कलेक्ट्रेट पहुंचेगा, तो वहां की मखमली घास में बैठकर अपना सारा दुख भूल जाएगा। विकास के इस क्रूर मजाक का एक और स्मारक 42 करोड़ रुपयों से बना बायोगैस प्लांट है, जिसे चलाने के लिए गोबर तक का इंतजाम नहीं किया गया। ये बायोगैस प्लांट प्रशासनिक दूरदर्शिता के मकबरे बनकर खड़े हैं। सीएजी की रिपोर्ट कहती है कि जो पैसा इन महान प्रयोगों से बच गया, उसे बाबू तंत्र ने बिना किसी वित्तीय समझ के साधारण बचत खातों में सड़ाकर करोड़ों रुपयों के ब्याज का नुकसान कर दिया। और तो और डीएमएफ की पारदर्शिता के लिए सोशल ऑडिट की जिम्मेदारी भी उन्हें ही सौंप दी गई, जो पैसा लूटा रहे थे। जब कातिल ही मुंसिफ बन बैठे, तो फैसला क्या होना था? कोई ऑडिट हुई ही नहीं।डीएमएफ के नाम पर हुआ यह खिलवाड़ उन गरीब और लाचार लोगों के साथ किया गया एक गहरा विश्वासघात है, जिनके फेफड़ों में जमी खदान की धूल और उजड़ी हुई जिंदगियों की कीमत पर यह फण्ड इकट्ठा किया गया था।
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फाइव स्टार दावत
राजधानी रायपुर का मिजाज आजकल कुछ बदला-बदला सा है। आईटीसी, जे डब्ल्यू मैरियट, नोवोटेल, ताज गेटवे, लेमन ट्री और द ललित जैसे दिग्गज ब्रांड्स अपने प्रीमियम कमरों का शानदार बुफे सजाने जा रहे हैं। कुछ सालों में शहर के हॉस्पिटैलिटी बाजार में 2000 से अधिक नए लग्जरी कमरे जुड़ जाएंगे। यह भारी भरकम निवेश राजधानी के बढ़ते रसूख की एक बानगी तो है, लेकिन अर्थशास्त्र का एक सीधा सा सवाल यह भी है कि क्या हमारा स्थानीय बाजार इस फाइव स्टार दावत को साल भर पचाने के लिए तैयार है? व्यावहारिक तौर पर देखें तो फिलहाल हमारे होटल कारोबार की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से स्टील और सीमेंट के कारोबारियों और सरकारी आयोजनों के साथ-साथ शादियों के भरोसे ही चलती है। महानगरों की तरह रायपुर के पास अभी कोई विशाल आईटी कॉरिडोर या बहुराष्ट्रीय कंपनियों के ऐसे क्षेत्रीय मुख्यालय नहीं हैं, जो विदेशी मेहमानों और कॉर्पोरेट एग्जीक्यूटिव्स से साल भर इन कमरों में 60-70 फीसदी ऑक्यूपेंसी की गारंटी दे सके। ऐसे में अचानक 2000 नए कमरों की एंट्री मांग और आपूर्ति के बीच एक दिलचस्प कुश्ती का मैदान तैयार कर रही है। हॉस्पिटैलिटी सेक्टर का सबसे बड़ा सिरदर्द उसकी मौसमी मेहमाननवाजी है। ऑफ सीजन में इन 2000 अतिरिक्त कमरों का सन्नाटा तोड़ना आसान नहीं होगा। खाली कमरों का यह भारी दबाव ऑफ सीजन में होटलों के बीच एक ऐसी प्राइस वॉर छेड़ सकता है, जहां नए और पुराने दोनों होटलों को अपनी दरें आम आदमी के बजट के करीब लानी पड़ जाएंगी। इसके इतर अंतरराष्ट्रीय उड़ानों और किसी विश्वस्तरीय कन्वेंशन सेंटर का अभाव भी ग्लोबल सम्मेलनों को राजधानी तक खींच लाने में एक बड़ा रोड़ा है। कुल मिलाकर स्थिति यह है कि रायपुर प्रीमियम कमरों की संख्या के मामले में तो महानगरों की बराबरी करने को बेताब है, लेकिन जब तक यहां संगठित बिजनेस टूरिज्म और हाई वैल्यू इंडस्ट्री का पक्का इंतजाम नहीं होता, तब तक इन चमकते होटलों के लिए अपने भारी निवेश पर मुनाफा कमाना एक कड़ी व्यावसायिक परीक्षा ही साबित होगा।
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गुरू
कहने को तो यह यूथ कांग्रेस का चुनाव था, लेकिन दांव राजनीति के उन पुराने और मंझे हुए खिलाड़ियों के लगे थे, जो असली बिसात बिछाना जानते हैं। स्थिति कुछ ऐसी बन गई थी मानो मैदान में हेलमेट पहनकर बैटिंग करने के लिए खुद पुराने दिग्गज उतर आए हो। असल में यह यूथ कांग्रेस का चुनाव कम, गुरू और चेले के बीच शक्ति परीक्षण का अखाड़ा ज्यादा बन गया था। हुआ यूं कि चेले को यह मुगालता हो गया कि अब वह खुद उस्ताद बन चुका है। उसने अपने प्रत्याशी को जिताने के लिए ऐसी तगड़ी फील्डिंग सजाई कि गुरु को भी अपना आराम त्यागकर पूरी ताकत के साथ मैदान में उतरना पड़ा। हालांकि गुरु का रौद्र रूप देखकर चेले को जल्द ही समझ आ गया कि सिर्फ अपने दम पर पार पाना मुश्किल है। लिहाजा वह फौरन ‘बाबा’ और ‘महंत’ की शरण में जा पहुंचा। इसके बाद इन तीनों की जो तिकड़ी बनी, उसकी तस्वीरों ने सोशल मीडिया रील्स पर खूब सुर्खियां बटोरीं। इस माहौल को देखकर युवा साथियों को भी लगने लगा कि अब तो यह नया गुट ही उनका तारणहार बनेगा, लेकिन राजनीति की स्क्रिप्ट हमेशा सस्पेंस से भरी होती है। जैसे ही वोटिंग खत्म होने का वक्त करीब आया पर्दे के पीछे के किरदार अचानक बदल गए। जो लोग रील में साथ थे, वो रियल लाइफ में किनारा कर गए। ऐन मौके पर गुरु की तरफ से ऐसा भाला चला कि पूरा चुनावी समीकरण ही उलट गया। इस पूरी उठापटक में गुरु के दो पुराने चेले बस आकाश की ओर ताकते रह गए। जब कुछ समझ नहीं आया, तो दिल्ली दरबार में फर्जी वोटिंग की शिकायत भरी अर्जियां भेज दी गईं। मगर राजनीति का दस्तूर है कि यहां आधी अर्जियां तो यूं ही फर्जी साबित कर दी जाती हैं। इसी हताशा में आकर सोशल मीडिया पर भी खूब भड़ास निकाली गई। हालांकि कुछ ही देर बाद भूल का अहसास हुआ और तत्काल पोस्ट डिलीट कर दी गई, लेकिन तब तक तकनीक अपना काम कर चुकी थी। स्क्रीनशॉट के रूप में सबूत सीधे गुरु के व्हाट्सएप पर लैंड कर चुका था। फिलहाल स्थिति यह है कि यूथ कांग्रेस चुनाव के वोटों की गिनती अभी बाकी है और नतीजे आने में थोड़ा वक्त है, लेकिन इस पूरे एपिसोड के बाद कांग्रेस के भीतर एक मैसेज बिल्कुल साफ हो गया है कि हम साथ-साथ हैं… बैकग्राउंड में चल रहे म्यूजिक के साथ कोई कितने ही रील्स बना ले, ‘गुरू’ अभी ‘गुरू’ ही है। ‘चेले’ को ‘गुरू’ बनने में अभी थोड़ा वक्त है।
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