Column By- Ashish Tiwari, Resident Editor Contact no : 9425525128

फर्जी चिट्ठी

एक चिट्ठी ने खूब बवाल मचा दिया। मामला एक सेंट्रल एजेंसी की जांच से जुड़ा है। लंबे समय तक जांच एजेंसी की रडार से गायब रहे एक रसूखदार नेता के बेटे के नाम से किसी ने पीएमओ और जांच एजेंसी के आला अफसरों को चिट्ठी भेज दी। चिट्ठी का मजमून कुछ यूं था कि घोटाले की जांच में मशरूफ अफसरों ने जमकर उगाही कर रखी है। अब उगाही की शिकायत पर दिल्ली के भी कान खड़े हो गए। सो चिट्ठी नोटशीट पर आ गई। शिकायत पर जांच बिठा दी गई। इधर जब जांच आगे बढ़ी और तफ्तीश से मालूमात हासिल की गई, तब पता चला कि रसूखदार नेता के बेटे के नाम का इस्तेमाल कर किसी अपरिचित शख्स ने ये कारनामा किया है। यह चिट्ठी पूरी तरह से फर्जी थी। इस नतीजे ने जांच एजेंसी और उसके अफसर को राहत तो दे दी, लेकिन सिस्टम की एक बड़ी कमजोरी को उजागर कर दिया। सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाली बात यह है कि चिट्ठी में रसूखदार नेता के बेटे का नाम देखकर पूरा सिस्टम कैसे हड़बड़ा गया? घोटाले की जांच कर रहे अफसर का दामन पूरी तरह पाक साफ था, तो महज एक चिट्ठी से इतनी खलबली क्यों मच गई? एक शिकायत पर आनन-फानन में जांच का आदेश देना यह बताता है कि महकमे के भीतर उगाही की आशंका को सिरे से खारिज करने का आत्मविश्वास शायद खुद एजेंसी के पास भी नहीं था। शिकायती चिट्ठी भले ही फर्जी साबित हो गई हो, लेकिन उस चिट्ठी ने एजेंसी का जो पसीना निकाला, वह बिल्कुल असली था।

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सरकारी कुर्सी

एक अफसर थे, जिन्होंने पिछली सरकार से लेकर हाल के दिनों तक एक विभाग में ऐसा झंडा गाड़ रखा था कि उन्हें हटाने के लिए अच्छे-अच्छो की हिम्मत जवाब दे गई थी। अफसर का खूब दबदबा था। हाल ही में एक तबादला सूची में जब उस अफसर के नाम का जिक्र आया, तब कईयों ने राहत की सांस ली। रुआबदार अफसर थे, लेकिन वह भूल गए थे कि सरकारी कुर्सी किसी एक की नहीं होती। सरकारी कुर्सी लंबे समय तक एक ही जगह एक ही अफसर को बर्दाश्त नहीं करती। खैर, ताजा जानकारी ये है कि एक महकमे के बड़े अफसर को जब इस बात का इल्म हुआ कि उन्हें बदला जा सकता है, तब वह फौरन हरकत में आ गए। सूबे में सत्ताधारी दल के आला नेताओं से खूब मिन्नते की कि उन्हें जस का तस बना रहने दिया जाए। नेताओं ने भी खूब जतन किए, लेकिन जब बात सूबे के नेताओं के दायरे से बाहर जाती दिखाई पड़ी, तब अफसर ने एक केंद्रीय मंत्री से अपनी पैरवी करा ली। मगर हर बार तकदीर वैसी तस्वीर नहीं दिखाती, जैसा अफसर ने चाहा था। बात कहीं जाकर अटक गई। तबादले की सूची में नाम आ गया। वैसे अटकी हुई बात को लेकर एक चर्चा यह भी है कि बंगले से जितनी रकम मांगी गई थी, अफसर ने पहुंचाया नहीं। अफसर को लगा था कि पैरवी से कुर्सी बच जाएगी और पैसे भी खर्च नहीं करने पड़ेंगे। अब वहीं अफसर यह कहते फिर रहे हैं कि गजब का जंगलराज चल रहा है। अगर उनकी पैरवी नतीजे दे जाती तब उनके मुंह से कुछ और बुलबुले फूटते। 

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हेल्पलाइन

अमूमन सरकारें ऑल इज वेल का चश्मा पहनना पसंद करती हैं, लेकिन न जाने किस शुभ मुहूर्त में इस सरकार ने सीएम हेल्पलाइन शुरू कर उड़ता तीर लपकने का जोखिम उठा लिया। 9 जून से अब तक महज पांच महीने में 2 लाख 31 हजार शिकायतें आ गिरी। हालांकि दावा किया जा रहा है कि 88 फीसदी शिकायतों का निराकरण भी हो गया है। पिछले दिनों सीएम हेल्पलाइन का काम परखने के लिए मुख्यमंत्री खुद नायक फिल्म के अनिल कपूर वाले अंदाज में सीधे सीएम हेल्पलाइन के दफ्तर जा धमके। वहीं से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कलेक्टरों को जोड़कर उनकी क्लास लगाई गई। जो कलेक्टर परफॉर्मेंस के नाम पर कुंभकर्णी नींद में थे, उन्हें धीरे से कड़वी घुट्टी पिला दी गई। एक तहसीलदार पर सीएम का पारा चढ़ा तो उसे तुरंत सस्पेंड कर दिया गया। शिकायतों का टॉप ट्रेंडिंग चार्ट देखें तो इसमें कोई सस्पेंस नहीं है। वही पुरानी प्रचलित शिकायतें है। जैसे- जमीन, नामांकन, बंटाकन, सीमांकन, सड़क-पानी-बिजली इत्यादि। अधिकारियों की हेल्प बंद करके जनता के लिए लाइन तो खोल दी गई है। पहल वाकई धांसू है। बस दुआ कीजिए कि जिस रफ्तार से शिकायतें आ रही हैं, उसी रफ्तार से समाधान भी होता रहे। 

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हमारे कलेक्टर

सीएम हेल्पलाइन की ताजा समीक्षा के बाद एक गंभीर विमर्श में स्याह सच सामने आया। हमारे ज्यादातर जिलों के माई-बाप यानी कलेक्टर साहबान, जिनके कंधों पर राजस्व प्रशासन की पूरी इमारत टिकी है, उन्हें भू राजस्व संहिता का ककहरा भी ठीक से याद नहीं है। प्रावधान बड़ा स्पष्ट है कि राजस्व का हर 7 वां केस कलेक्टर खुद सुनेंगे। डायवर्सन जैसे मामलों की सुनवाई कलेक्टर करेंगे, लेकिन कलेक्टर कोर्ट लगाना कलेक्टरों की प्राथमिकताओं में नहीं रहा। एक वो भी दौर था जब कलेक्टर राजस्व के सबसे उलझे और पेंचीदा मामलों को खुद चुनकर सुलझाया करते थे और एक आज का दौर है। खैर, सबसे शर्मनाक पहलू आदिवासी जमीनों की खरीद-फरोख्त में नजर आता है। कानून ने कलेक्टर को सिर्फ मुंसिफ ही नहीं बल्कि आदिवासियों के हक का रक्षक भी बनाया था। जब कभी कलेक्टर कोर्ट में आदिवासी जमीन, गैर आदिवासी को बेचने की अनुमति का मामला आता, तब जमीन बेचने वाले गरीब आदिवासी और रसूखदार खरीदार को आमने-सामने खड़ा कर तस्दीक की जाती थी कि सौदे में आदिवासी को जमीन की पाई-पाई मिल भी रही है या नहीं? तब कलेक्टर सिर्फ आंख मूंदकर दस्तखत करने वाली मशीन नहीं हुआ करते थे, लेकिन आज सिस्टम ने आंखों पर गांधारी की पट्टी बांध ली है। आदिवासी की जमीन औने-पौने दामों में छिन रही है और जवाबदेह कुर्सियों पर बैठे लोग खामोशी से मुहरें ठोक रहे हैं। अगर सरकार ने बीते कुछ सालों में आदिवासी जमीनों पर कलेक्टरों के आदेशों की गलती से भी निष्पक्ष जांच करा ली, तो सूबे के कई नामी तुर्रम खां और रसूखदार अफसर सीधे जांच की आंच में झुलसते नजर आएंगे। कानून को ताक पर रखकर फाइलों में जो खेल खेला गया है, उसके सुबूत हर जिले के रिकॉर्ड रूम में दफ्न हैं। 

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नेमप्लेट

छत्तीसगढ़ के पहले दिल्ली के सियासी गलियारों में मंत्रिमंडल फेरबदल की सुगबुगाहट इन दिनों पूरे उफान पर है। इस बार चर्चाओं का वजन इतना है कि कइयों का एग्जिट गेट लगभग साफ नजर आने लगा है। बदलाव की इस पटकथा की शुरुआत राज्यसभा की वैलिडिटी खत्म होने से हो रही है। दरअसल पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी और खाद्य मंत्री बी एल वर्मा का राज्यसभा कार्यकाल 25 नवंबर को खत्म हो रहा है और पार्टी ने उन्हें दोबारा वहां न भेजने का फैसला किया है। ऐसे में पूरी संभावना है कि तय समय से पहले ही उनसे इस्तीफा ले लिया जाए। केंद्रीय मंत्री रहे एल मुरुगन के हालिया इस्तीफे ने इन चर्चाओं पर पहले ही मुहर लगा दी है। इस्तीफों की इस कतार में ये कोई अकेले नाम नहीं हैं। इससे पहले धर्मेंद्र प्रधान की विदाई हो चुकी है, वहीं जॉर्ज कुरियन और रवनीत सिंह बिट्टू को भी राज्यसभा सदस्यता खत्म होने के चलते अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी है। विदाई की इस लिस्ट में सिर्फ राज्यसभा वाले ही नहीं है, बल्कि लोकसभा के कुछ दिग्गज भी शामिल हैं जिन पर एक व्यक्ति-एक पद के उसूल की गाज गिरने वाली है। यूपी के पंकज चौधरी और दिल्ली से इकलौते मंत्री हर्ष मल्होत्रा मजे से केंद्रीय मंत्री होने के साथ-साथ अपने राज्यों के प्रदेश अध्यक्ष का पद भी संभाल रहे थे, लेकिन यूपी में चुनाव करीब आते ही विपक्ष के तानों ने पार्टी को अपना पुराना सिद्धांत याद दिला दिया है। अब पूरी तैयारी है कि इन दोनों नेताओं से मंत्री पद वापस लेकर उन्हें सिर्फ संगठन के काम तक सीमित कर दिया जाए। दिल्ली में चल रही इस म्यूजिकल चेयर की आंच का छत्तीसगढ़ तक पहुंचना भी लगभग तय माना जा रहा है। चर्चा प्रबल है कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के मंत्रिमंडल में भी जल्द ही बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे। आने वाले दिनों में दिल्ली से लेकर रायपुर तक कई नेताओं का नेमप्लेट बदलना तय है।

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बोर्डिंग पास

दिल्ली के सत्ता गलियारों में इस बार जो सियासी गणित चल रहा है, उसमें शायद दो दशक बाद पहली बार बस्तर को मौका मिल सकता है। राज्य बनने के बाद से केंद्रीय मंत्रिमंडल की वीआईपी बस में बस्तर को कभी सीट नहीं मिली, लेकिन इस बार हवाओं का रुख बता रहा है कि सांसद महेश कश्यप को यह बोर्डिंग पास मिल सकता है। जातीय समीकरणों में आदिवासी वोट बैंक को लॉक करने का फॉर्मूला बिल्कुल सेट है। एक आदिवासी मुख्यमंत्री राज्य की गद्दी पर और एक आदिवासी मंत्री दिल्ली के दरबार में। इसके बाद मजाल है जो यह वोट बैंक कहीं और खिसक जाए। वैसे भी मोदी सरकार के शुरूआती दो कार्यकाल को देखें, तो पहले कार्यकाल में विष्णुदेव साय और दूसरे कार्यकाल में रेणुका सिंह को केंद्रीय मंत्रीमंडल में सीट मिली थी। तीसरे कार्यकाल में यह कुर्सी बस्तर के चेहरे के हिस्से जाती नजर आती है। अगर ऐसा हुआ तो मुमकिन है कि तोखन साहू राज्य में पार्टी की अगुवाई करते दिखेंगे, जिसकी चर्चा लंबे समय से चल रही है। एक दफे तोखन साहू से जब यह पूछा गया था, तब उन्होंने इस सवाल का जवाब अपनी मुस्कुराहट से दिया था। बहरहाल इधर बाकी जातियों को साधने का काम भी पार्टी ने बड़ी सफाई से किया है। अरुण साव और तोखन साहू के जरिए साहू समाज को सेट कर लिया गया है और गजेंद्र यादव के सहारे यादवों का वोट बैंक भी सुरक्षित वॉल्ट में डाल दिया गया है। बस एक पेंच कुर्मी वोटों का फंसा है, जो फिलहाल भाजपा और कांग्रेस के बीच बंटा हुआ है। माना जा रहा है कि अगर विजय बघेल को भी केंद्रीय मंत्री का तमगा पहना दिया जाए, तो यह स्विंग करता हुआ कुर्मी वोट का कुछ और हिस्सा चुंबक की तरह भाजपा के खाते में आ चिपकेगा। जातियों की यह बिसात अगर ऐसे ही बिछ गई, तो विपक्ष को शायद अगली बार चुनाव लड़ने से पहले अपना नया सियासी गणित हल करना पड़ जाएगा। 

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मंत्रिमंडल की सर्जरी

छत्तीसगढ़ की सत्ता के गलियारों में बदलाव का नया मसौदा बेहद खामोशी से तैयार हो रहा है। साय मंत्रिमंडल के संभावित फेरबदल की आहट ने सबसे ज्यादा बेचैनी उन मंत्रियों में पैदा की है, जो यह मान बैठे थे कि लाल बत्ती एक बार मिल गई तो पांच साल के लिए उनकी एफडी पक्की हो गई, लेकिन हालिया सर्वे रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि साय मंत्रिमंडल के चार-पांच मंत्रियों का परफॉर्मेंस औंधे मुंह जमीन पर गिरा है। अब सुशासन की इस रिपोर्ट कार्ड ने सत्ता के गलियारों में खौफ पैदा कर दिया है। मंत्री एक दूसरे को कौतूहल भरे अंदाज से देखकर यह सोचने लगे हैं कि कौन सा मंत्री अब पूर्व होने वाला है। बहरहाल सत्ता के भूगोल का विरोधाभास भी कम मारक नहीं है। जिस बस्तर के इर्द-गिर्द पूरे प्रदेश की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान बुनी गई है, उसे कैबिनेट में महज एक चेहरे के साथ रस्म अदायगी का झुनझुना थमा दिया गया है। वहीं सरगुजा संभाग पर इतनी मेहरबानी हुई कि मुख्यमंत्री समेत वहां से पांच मंत्रियों की पूरी एक कतार खड़ी कर दी गई। अब इसी भौगोलिक असंतुलन की सर्जरी होने वाली है। चर्चा है कि सरगुजा से कम से कम दो चेहरों को मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है, ताकि बस्तर का वजन बढ़ाया जा सके। तोखन साहू के प्रदेश अध्यक्ष बनने की स्थिति में किरण सिंह देव को हाशिए पर नहीं धकेला जाएगा, उन्हें साय सरकार में मंत्री बनाकर उनका उचित विस्थापन किया जाएगा। सरकार में केदार कश्यप बतौर मंत्री पहले से बस्तर का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। एक चर्चा लता उसेंडी के नाम की भी जोर शोर से चल रही है। लता की एंट्री से लक्ष्मी की कुर्सी हिल सकती है। मैदानी इलाके से भी कुछ इस तरह की ही खबर है। मैदानी इलाके से सरकार में आठ मंत्री हैं। इनमें से भी दो मंत्री को बाहर का रास्ता दिखाने की तैयारी है। ऐसी सूरत में अमर अग्रवाल, अजय चंद्राकर और राजेश मूणत में से किसी की लाटरी लग जाए तो कोई बड़ी बात नहीं। वैसे भी संगठन के भीतर इस बात की चर्चा जोर पकड़ रही है कि सरकार में सीनियर चेहरों की बतौर मंत्री ताजपोशी कर दी जाए। सरकार की यह संभावित सर्जरी प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने की कवायद कम और राजनीतिक असंतोष के मुहानों को बंद करने का डैमेज कंट्रोल ज्यादा दिख रहा है। बदलाव की सुगबुगाहट के बीच पहली बार के एक मंत्री की टिप्पणी भी काबिलेगौर है कि राजनीति में प्रदर्शन हमेशा समीकरणों के आगे बौना ही साबित होता है।

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एमएसटी

मंत्रिमंडल में संभावित बदलाव की सुगबुगाहट के बीच सत्ताधारी दल के दफ्तर में एक रोज संगठन के चंद नेताओं की बैठकी में मंत्रियों की कारस्तानियों की चर्चा छिड़ गई। मंत्रियों के बंगलों में आए दिन तफरी करने वाले एक नेता ने बताया कि मौसम विभाग की किसी चेतावनी के बिना ही कुछ माननीय मंत्रियों के निजी रडार पर कुर्सी छिन लिए जाने का सायरन बज उठा है। मंत्री भी यह समझ गए हैं, सो विदाई की बेला में उनका जनहित का आदर्श, धनहित की व्यावहारिक आवश्यकताओं के आगे अचानक बौना हो गया है। कुछ मंत्रियों की स्थिति परीक्षा हाल में बैठे उन छात्रों की तरह हो गई है, जो समय खत्म हो जाने की अंतिम घोषणा के बाद बदहवासी की स्थिति में पर्चा लिखते हैं। उनके बंगलों में अब एक ही सिद्धांत है- सब कुछ बिकेगा और उसी दाम पर बिकेगा, जो मेज के नीचे तय होगा। बंगलों में रेट कार्ड चस्पा कर दिया गया है। संदेश बड़ा स्पष्ट है कि सरकारी जीएसटी से पहले माननीय मंत्री जी का एमएसटी यानी मिनिस्टर सर्विस टैक्स भरना होगा। मंत्री जी के लेटरहेड पर होने वाले अनुशंसा भरे पत्र को भी अब परमार्थ की श्रेणी से हटाकर उस पर निश्चित शुल्क निर्धारित कर दिया गया है। पीए से लेकर ओएसडी तक पूरा का पूरा अमला ऐसी टीम में तब्दील कर दिया गया है, जिस पर हर हाल में सेल्स टारगेट पूरा करने का दबाव है। जिन फाइलों में मुनाफे की कोई गुंजाइश नहीं है, उन्हें जन आकांक्षाओं की तरह रद्दी की टोकरी में फेंक दिया जा रहा है। संगठन के नेता ने आगे बताया कि पिछले दिनों एक छोटे से काम के ऐवज में मंत्री के ओएसडी ने फरियादी से दो लाख रुपए मांग लिया। काम बस इतना था कि उस व्यक्ति से जुड़े एक काम के लिए मंत्री जी का अनुशंसा पत्र चाहिए था। ओएसडी ने मंत्री के नाम से वसूली कर ली। यह कहते हुए कि इस महीने का टारगेट पूरा करना है। सबका साथ-सबका विकास का नारा अब कुछ मंत्रियों के लिए पूरी निष्ठा के साथ अपना विकास-बाकी सब बकवास के यथार्थवादी दर्शन में सिमट चुका है। 

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