राकेश चतुर्वेदी की कलम से

बेटा कांड से नम्र हुए विधायक चालान कटवाने खुद पहुंचे पुलिस के पास

पुलिस को हैसियत दिखाने और ढ़ाई किलो के हाथ का बयान देने वाले बुंदेलखंडी विधायक का चालान कट गया. बेटे के साथ हुए कांड के बाद तो विधायकजी जमकर आग-बबूला हो हुए थे. उस दौरान विधायकजी को जितना अधिक जोश आया था, लगता है अब उतने ही अधिक नम्र हो गए हैं. क्षेत्र में यह बात इसलिए कही जा रही है क्योंकि गलती होने पर विधायक खुद ही चालान कटवाने पुलिस के पास पहुंच गए. हुआ यूं कि विधायक बाइक तिरंगा यात्रा में शामिल हुए, लेकिन हाथ में तिरंगा थामने के दौरान हेलमेट लगाना भूल गए. इस दौरान पुलिस की उन पर और उनकी पुलिस पर नजर पड़ी तो विधायक जी खुद ही पुलिस के पास पहुंच गए और हेलमेट नहीं लगाने का नियम तोड़ने पर पूरे 300 रुपए का चालान कटवा लिया. अब चर्चा यह भी है कि विधायकजी ने तो अपना चालान कटवा लिया, लेकिन बिना हेलमेट मोटरसाइकिल दौड़ाने वाले समर्थकों के लिए नियमों का क्या हुआ. इस पर न विधायकजी का ध्यान गया न ही विधायक का चालान काटने वाली पुलिस का.

प्रवक्ताओं की संख्या से प्रदेश संगठन सकते में

छह महीने की कवायद मीडिया विभाग की सूची हाईकमान से छनकर आई तो प्रदेश संगठन सकते में आ गया. जहां प्रवक्ताओं की संख्या 53 हुआ करती थी, वहां का आंकड़ा सिर्फ 20 का. वो महत्वपूर्ण चेहरे जो जरूरी थी, सूची में उनका न नाम था और न ही सरनेम. वरिष्ठ नेताओं के साथ विचार-विमर्श हुआ और प्रदेश स्तर पर ऐसे नाम जोड़ने का फैसला लिया गया. खबर है कि दिल्ली से आई सूची में नए नाम जोड़कर वापस भेज दी गई है. निवेदन किया गया है कि सूची में पहले के बराबर अंक भले ही न हों, लेकिन कम से कम 53 के आधे तो हों. प्रदेश संगठन को उम्मीद है कि जिन आईएमपी नामों की सिफारिश की गई है, उनकी सुनवाई जरूर होगी.

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वल्लभ भवन के गलियारों में एनेक्सी पॉलिटिक्स

इन दिनों मंत्रालय में चर्चाओं का माहौल बेहद गर्म है. वरिष्ठ मंत्रियों के दो विभागों में जमकर पॉलिटिक्स हो रही है. दरअसल, मामला एक विभाग के टेंडर से जुड़ा हुआ है. दोनों विभागों का एक ही मामले का टेंडर जारी हुआ. लेकिन दोनों ही विभागों में अधीनस्थ सुपर सीनियर अफसर और वरिष्ठ अधिकारी के बीच नहीं बनी. लिहाजा बड़े साहब ने छोटे साहब की एक जबरिया नोट शीट टेंडर को लेकर जारी कर दी. छोटे साहब भी कम न थे. उन्होंने भी बड़े साहब की दर्जनों फाइल विभागीय मंत्री जी के बंगले पर पहुंचा दी. मंत्रालय में राजनीति का ऐसा ही मामला और खूब बोल रहा है. मामला मंत्रीजी और वरिष्ठ अधिकारी के बीच खटपट होने के साथ एनेक्सी पॉलिटिक्स में तब्दील हो गया है. मंत्रीजी ने भी लंबे खेल खेले हैं, लेकिन फिलहाल एक वरिष्ठ अधिकारी से थोड़ा शिकस्त खा रहे हैं.

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सरकारी अस्पताल में शुल्क को लेकर चर्चा

राजधानी के बड़े सरकारी अस्पताल को लेकर इन दिनों एक चर्चा खूब जोर पकड़ रही है. अस्पताल में आने वाले मरीजों और उनके परिजनों के बीच यह बात चर्चा का विषय बनी हुई है कि जनरल वार्ड में भी अब शुल्क तय कर दिया गया है. आमतौर पर सरकारी अस्पताल में मरीज कम खर्च में इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचता है, लेकिन चर्चा है कि जनरल वार्ड में भर्ती होने के लिए भी जेब ढीली करनी पड़ सकती है. ऐसे में मरीज और परिजन आपस में मजाकिया अंदाज में पूछ रहे हैं कि भाई सरकारी अस्पताल में इलाज कराने आए हैं या होटल में कमरा बुक कराने. पहले प्राइवेट अस्पतालों के बिल देखकर लोग परेशान होते थे. अब अगर सरकारी अस्पताल के जनरल वार्ड में भी शुल्क लगा तो सवाल उठना लाजिमी है. सवाल ये है कि आखिर राहत वाली जगह पर भी रेट लिस्ट क्यों आ गई है. अस्पताल में आने वाले लोगों के बीच तरह-तरह की बातें हो रही हैं. कोई कह रहा है कि जनरल वार्ड भी अब पेड हो गया तो कोई पूछ रहा है कि अगला नंबर कहीं मरीज के साथ आने वाले अटेंडर की कुर्सी का तो नहीं है.

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