पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने न्यायपालिका के नाम पर ठगी करने वाले आरोपी जितेंद्र सिंह की जमानत याचिका खारिज कर दी है। आरोपी पर जजों से संबंध बताकर लाखों रुपये वसूलने का गंभीर आरोप है।
कृष्ण कुमार सैनी, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने न्यायपालिका में प्रभाव होने का झूठा दावा कर लाखों रुपये की कथित ठगी के मामले में आरोपी जितेंद्र सिंह उर्फ जीतू को राहत देने से इनकार कर दिया है। हाईकोर्ट के जस्टिस Vinod S. Bhardwaj ने आरोपी की नियमित जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि न्यायिक अधिकारियों पर प्रभाव होने का झूठा दावा कर लोगों से धन ऐंठना न केवल गंभीर अपराध है, बल्कि इससे न्याय व्यवस्था में जनता का विश्वास भी प्रभावित होता है।
अदालत के समक्ष आए मामले के अनुसार, आरोपियों ने शिकायतकर्ता को भरोसा दिलाया था कि उनके पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के जजों से संबंध हैं और वे उसके पिता से जुड़े लंबित सर्विस मामले में उसके पक्ष में आदेश पारित करवा सकते हैं। इस कथित प्रभाव का हवाला देकर शिकायतकर्ता से अलग-अलग किश्तों में करीब 28.5 लाख रुपये वसूले गए। आरोप है कि शिकायतकर्ता का विश्वास बनाए रखने के लिए फर्जी न्यायिक आदेश भी दिखाए गए और लगभग 98 लाख रुपये का नकली चेक तक प्रस्तुत किया गया।
बाद में जब शिकायतकर्ता को पता चला कि दिखाए गए दस्तावेज जाली हैं और अदालत की ओर से ऐसा कोई आदेश पारित ही नहीं हुआ, तब उसने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर एफआईआर दर्ज की गई। जांच के दौरान यह मामला न्यायपालिका के नाम पर प्रभाव दिखाकर धोखाधड़ी करने की कथित साजिश से जुड़ा पाया गया।
जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान आरोपी पक्ष ने दलील दी कि वह मुख्य आरोपी के यहां केवल ड्राइवर के रूप में कार्यरत था और उसे झूठा फंसाया गया है। वहीं, राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि आरोपी शिकायतकर्ता से धनराशि एकत्र करने और उसे अनुकूल आदेश दिलाने का भरोसा देने की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल था।
अपने आदेश में अदालत ने कहा कि न्यायिक संस्थाओं की वैधता जनता के विश्वास पर आधारित होती है। यदि कोई व्यक्ति न्यायिक कार्यप्रणाली पर प्रभाव होने का झूठा दावा कर वादियों को गुमराह करता है, तो यह केवल धोखाधड़ी का मामला नहीं बल्कि न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी सीधा प्रहार है। अदालत ने मामले को प्रथम दृष्टया एक सुनियोजित और संगठित साजिश मानते हुए कहा कि आरोपों की गंभीरता, कथित धोखाधड़ी की प्रकृति और उपलब्ध तथ्यों को देखते हुए आरोपी को नियमित जमानत दिए जाने का कोई आधार नहीं बनता। इसलिए उसकी जमानत याचिका खारिज की जाती है।

