कृष्ण कुमार सैनी, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने करीब 22 वर्ष पुराने दहेज मृत्यु मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए पति भानु प्रकाश को बड़ी राहत दी है। जस्टिस मंदीप पन्नू की अदालत ने भानु प्रकाश की अपील स्वीकार करते हुए यमुनानगर की ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सात वर्ष के कठोर कारावास की सजा को रद्द कर दिया। हाई कोर्ट ने उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 304-बी के तहत दोषी ठहराए जाने से बरी कर दिया।
मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि मृतका गीतिका को उसकी मौत से ठीक पहले दहेज की मांग को लेकर उसके पति की ओर से प्रताड़ित या परेशान किया गया था। अदालत ने कहा कि धारा 304-बी के तहत दोषसिद्धि के लिए अभियोजन को आवश्यक तथ्यों को संदेह से परे साबित करना होता है, लेकिन इस मामले में उपलब्ध साक्ष्य उस कसौटी पर खरे नहीं उतरते।
मौत से पहले दहेज प्रताड़ना साबित नहीं
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में विशेष रूप से इस पहलू पर गौर किया कि क्या गीतिका की मौत से ठीक पहले उसे दहेज की मांग को लेकर पति ने प्रताड़ित किया था। अदालत के अनुसार, अभियोजन की ओर से पेश साक्ष्यों से ऐसा तथ्य संदेह से परे स्थापित नहीं हो सका।
अदालत ने कहा कि केवल आरोप या सामान्य प्रकृति के आरोप धारा 304-बी के तहत दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं हैं। अभियोजन को यह साबित करना आवश्यक था कि मृतका को उसकी मौत से ठीक पहले दहेज की मांग के संबंध में पति की ओर से क्रूरता या उत्पीड़न का सामना करना पड़ा था।
संदेह का लाभ मिला
साक्ष्यों का मूल्यांकन करने के बाद हाई कोर्ट ने भानु प्रकाश को संदेह का लाभ दिया। अदालत ने उसकी अपील मंजूर करते हुए ट्रायल कोर्ट के दोषसिद्धि संबंधी फैसले को रद्द कर दिया। इसके साथ ही सात वर्ष के कठोर कारावास की सजा भी निरस्त कर दी गई।
यह मामला करीब 22 वर्ष से न्यायिक प्रक्रिया में चल रहा था। हाई कोर्ट के फैसले के बाद इस मामले में ट्रायल कोर्ट से दोषी ठहराए गए पति को बड़ी कानूनी राहत मिली है।
हाई कोर्ट का निष्कर्ष: अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि मृतका को उसकी मौत से ठीक पहले दहेज की मांग को लेकर पति ने प्रताड़ित किया था। इसी आधार पर अदालत ने दोषसिद्धि को बरकरार रखने से इनकार करते हुए आरोपी को बरी कर दिया।
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