Rajasthan News: राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में हत्या के मामले में आरोप तय करने के आदेश को रद्द करते हुए ट्रायल कोर्ट को नए सिरे से कानून के अनुसार विचार करने के निर्देश दिए हैं। याचिकाकर्ता रीमा जो वर्तमान में झालावाड़ में वन संरक्षक (कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट) के पद पर कार्यरत हैं, ने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, फलोदी द्वारा 18 मार्च 2025 को पारित उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत आरोप तय किए गए थे।

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता धीरेन्द्रसिंह व सहयोगी प्रियंका बोराणा ने याचिका में कहा कि ट्रायल कोर्ट ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री का समुचित मूल्यांकन किए बिना और यांत्रिक तरीके से आरोप तय कर दिए। प्रारंभिक एफआईआर स्वयं याचिकाकर्ता द्वारा दी गई थी, जिसमें उन्होंने अपने पति और ससुराल पक्ष पर नवजात पुत्री की हत्या और स्वयं को जहर पिलाने के गंभीर आरोप लगाए थे। जांच के दौरान याचिकाकर्ता के बयान धारा 164 सीआरपीसी के तहत भी दर्ज हुए, जिनमें उन्होंने अपनी प्रारंभिक बातों को दोहराया।
हालांकि, चार्जशीट दाखिल करते समय जांच अधिकारी ने याचिकाकर्ता के पति व ससुराल पक्ष को दोषमुक्त करते हुए भूमिकाएं पलट दीं और स्वयं याचिकाकर्ता को आरोपी बना दिया। इसके बाद याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी हुई, हालांकि बाद में उन्हें हाईकोर्ट से जमानत मिल गई। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि आरोप तय करना आपराधिक प्रक्रिया का अत्यंत महत्वपूर्ण चरण है, जिसके गंभीर परिणाम आरोपी की स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा पर पड़ते हैं।
कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल यह लिख देना कि रिकॉर्ड देखने के बाद आरोप बनता है पर्याप्त नहीं है। आदेश में यह परिलक्षित होना चाहिए कि किन तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर ऐसा निष्कर्ष निकाला गया। वर्तमान मामले में ट्रायल कोर्ट का आदेश यांत्रिक प्रतीत होता है और इसमें याचिकाकर्ता की भूमिका, एफआईआर व बयानों की पृष्ठभूमि पर कोई विचार नहीं किया गया। इन आधारों पर हाईकोर्ट ने 18 मार्च 2025 का आदेश रद्द करते हुए मामला ट्रायल कोर्ट को वापस भेज दिया और निर्देश दिए कि अभियोजन व बचाव पक्ष को पूरा अवसर देकर आरोप के प्रश्न पर नए सिरे से, कारणयुक्त आदेश पारित किया जाए।
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