Rajasthan News: राजस्थान हाईकोर्ट ने बुजुर्गों की स्थिति और उनके अधिकारों को लेकर एक बेहद गंभीर और संवेदनशील टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि समय रहते बुजुर्गों की देखरेख सुनिश्चित नहीं की गई, तो भविष्य में समाज के सामने गहरा संकट पैदा हो जाएगा।

वृद्धाश्रम सिर्फ कागजों पर नहीं हो सकते
जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संगीता शर्मा की खंडपीठ ने ‘लोक उत्थान संस्थान’ द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में बुजुर्गों को भगवान का दर्जा प्राप्त है। लेकिन संयुक्त परिवारों के टूटने और शहरीकरण की अंधी दौड़ ने उन्हें बेसहारा बना दिया है। अदालत ने तल्ख लहजे में कहा कि वृद्धाश्रम सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं होने चाहिए; वहां रहने वाले हर बुजुर्ग को सम्मान, सुरक्षा और बेहतर चिकित्सा के साथ मानवीय गरिमापूर्ण जीवन जीने का पूरा अधिकार है।
रालसा को निरीक्षण के आदेश
हाईकोर्ट ने राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (RALSA) को प्रदेश के सभी वृद्धाश्रमों का दौरा करने के निर्देश दिए हैं। रालसा को 15 फरवरी तक अपनी रिपोर्ट पेश करनी होगी। निरीक्षण के दौरान निम्नलिखित बिंदुओं की जांच की जाएगी।
क्या वृद्धाश्रम की इमारतें सरकारी हैं?
- क्या वहां रहने वाले सभी व्यक्ति सीनियर सिटीजन हैं?
- पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हैं या नहीं?
- क्या सरकार की ओर से कोई वित्तीय सहायता प्रदान की जा रही है?
सरकारी दावों पर उठे सवाल
सुनवाई के दौरान जहां एक ओर बताया गया कि जयपुर के 4 केंद्रों सहित प्रदेश में कुल 31 वृद्धाश्रम हैं, वहीं प्रार्थी के अधिवक्ता नितिन सोनी ने इस पर कड़ा विरोध दर्ज कराया। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य सरकार कई पुनर्वास केंद्रों को भी वृद्धाश्रम बता रही है, जबकि जमीनी हकीकत में इतने वृद्धाश्रम संचालित ही नहीं हो रहे हैं।
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