Rajasthan News: थार मरुस्थल की पहचान कभी सेवण घास के हरे समंदर से होती थी। इसे हरा सोना कहा जाता था, लेकिन आधुनिकता और मशीनी खेती ने इसे रेगिस्तान से गायब कर दिया। अब इस घास को बचाने के लिए बीकानेर के पर्यावरण प्रेमियों ने कमर कस ली है। श्रीकोलायत के सीसा भैरूजी मंदिर की 471 बीघा ओरण भूमि पर एक बड़ा जनअभियान शुरू हुआ है। यहां अब ट्रैक्टरों से सेवण घास का बीजारोपण किया जा रहा है, ताकि मरुस्थल फिर से हरा-भरा हो सके।
क्यों है सेवण घास इतनी खास?
थार के पशुपालकों के लिए सेवण कभी लाइफलाइन हुआ करती थी। भीषण गर्मी और पानी की कमी के बावजूद यह घास पनपती रहती थी। महाराजा गंगा सिंह यूनिवर्सिटी के प्रो. अनिल छगाणी बताते हैं कि बीकानेर का विश्व प्रसिद्ध रसगुल्ला भी इसी घास की देन है। यहां की राठी नस्ल की गाय जब सेवण घास खाती हैं, तो उनके दूध में जो प्रोटीन मिलता है, वही रसगुल्ले को खास बनाता है। यह घास न केवल मरुस्थल को बंजर होने से बचाती है, बल्कि गोडावण जैसे विलुप्तप्राय पक्षियों के लिए भी कुदरती घर का काम करती है।

कैसे खत्म हुआ हरा सोना?
पिछले कुछ सालों में खेती का तरीका पूरी तरह बदल गया है। मशीनी जुताई और अंग्रेजी बबूल की बढ़ती संख्या ने सेवण घास के इलाकों पर कब्जा कर लिया है। देखते ही देखते ये बड़े-बड़े घास के मैदान लुप्त होने की कगार पर पहुंच गए। अब सरकार और स्थानीय लोग मिलकर अंग्रेजी बबूल को हटाने का काम कर रहे हैं।
जन सहयोग से बदली तस्वीर
सीसा भैरूजी ओरण भूमि पर पिछले 20 सालों से अतिक्रमण का साया था। पूर्व प्रधान जयवीर सिंह भाटी की अगुवाई में स्थानीय लोगों ने न सिर्फ इस जमीन को अतिक्रमण मुक्त कराया, बल्कि यहां के प्राचीन तालाबों को भी जिंदा किया है। अब यहाँ सेवण घास की बुवाई की जा रही है, जिससे क्षेत्र के गोवंश और अन्य पशुओं को सालभर प्राकृतिक चारा मिल सकेगा। यह मुहिम अब पूरे थार के लिए एक बड़ी मिसाल बन गई है। उम्मीद है कि जल्द ही थार के मैदान फिर से सेवण की हरियाली से लहलहा उठेंगे।
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