Rajasthan News: करीब 47 साल से चला आ रहा नर्मदा जल विवाद आखिरकार सुलझ गया है। दिल्ली में गृह मंत्री अमित शाह और जलशक्ति मंत्री सीआर पाटिल की मौजूदगी में चारों राज्यों ने वन-टाइम सेटलमेंट पर दस्तखत कर दिए हैं। इस समझौते के तहत राजस्थान अपनी हिस्सेदारी के करीब 550 करोड़ रुपये गुजरात को चुकाएगा।

राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के बीच हुए इस समझौते के बाद सरदार सरोवर परियोजना से जुड़े लंबित वित्तीय विवादों का रास्ता साफ हो गया है। समझौते के तहत राजस्थान अपनी लागत हिस्सेदारी के रूप में करीब 550 करोड़ रुपये गुजरात को देगा।
दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल की मौजूदगी में चारों राज्यों ने वन-टाइम सेटलमेंट पर हस्ताक्षर किए। इसके साथ ही वर्षों से चल रहे भुगतान संबंधी विवाद को खत्म करने पर सहमति बन गई।
हालांकि, इस समझौते को लेकर लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अब राजस्थान को नर्मदा का ज्यादा पानी मिलेगा। इसका जवाब है नहीं। इस समझौते में पानी के बंटवारे में कोई बदलाव नहीं किया गया है। राजस्थान का हिस्सा पहले भी 0.50 एमएएफ (मिलियन एकड़ फीट) था और आगे भी उतना ही रहेगा।
सरकार का कहना है कि इस समझौते का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि अब परियोजना से जुड़े रुके हुए काम तेजी से आगे बढ़ सकेंगे। इससे पश्चिमी राजस्थान में नहरों के विकास और पानी की आपूर्ति व्यवस्था को मजबूत करने में मदद मिलेगी।
इसका सीधा लाभ जालोर, सांचौर, बाड़मेर और सिरोही जैसे जिलों को मिलने की उम्मीद है। इन इलाकों में नर्मदा का पानी पेयजल और सिंचाई, दोनों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। हजारों गांवों की पानी की जरूरत इसी परियोजना से पूरी होती है और बड़ी संख्या में किसानों की खेती भी इसी पर निर्भर है।
दरअसल, नर्मदा नदी मध्य प्रदेश के अमरकंटक से निकलकर महाराष्ट्र और गुजरात होते हुए अरब सागर में मिलती है। नदी पर बने सरदार सरोवर बांध समेत कई बड़ी परियोजनाओं के निर्माण के दौरान लागत, पुनर्वास और खर्चों को लेकर राज्यों के बीच लंबे समय से मतभेद बने हुए थे।
इसी विवाद को सुलझाने के लिए केंद्र सरकार ने 1969 में नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण का गठन किया था। करीब दस साल की सुनवाई के बाद 1979 में पानी का बंटवारा तय हुआ। उस फैसले में राजस्थान के हिस्से में 0.50 एमएएफ पानी तय किया गया था, जबकि मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र के हिस्से भी निर्धारित कर दिए गए थे।
पानी का बंटवारा तय होने के बावजूद सरदार सरोवर परियोजना की लागत को लेकर विवाद खत्म नहीं हुआ। गुजरात का कहना था कि उसने परियोजना पर ज्यादा खर्च किया है, इसलिए बाकी राज्यों को अपनी हिस्सेदारी का भुगतान करना चाहिए। दूसरी ओर मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र ने भी अपने-अपने दावे किए। राजस्थान की लागत हिस्सेदारी का मामला भी कई वर्षों तक लंबित रहा।
इन्हीं लंबित दावों को खत्म करने के लिए अब चारों राज्यों ने वन-टाइम सेटलमेंट पर सहमति जताई है। इसके तहत राजस्थान करीब 550 करोड़ रुपये गुजरात को देगा और बाकी राज्यों के वित्तीय दावों का भी अंतिम निपटारा किया जाएगा।
राज्य सरकार का मानना है कि अब वित्तीय और प्रशासनिक अड़चनें दूर होने से नहर तंत्र को मजबूत करने और आखिरी छोर तक पानी पहुंचाने का काम तेज होगा। पश्चिमी राजस्थान के किसानों की लंबे समय से शिकायत रही है कि कई बार नहरों के अंतिम हिस्सों तक पर्याप्त पानी नहीं पहुंच पाता। सरकार का दावा है कि इस दिशा में अब बेहतर सुधार देखने को मिल सकता है।
सरकार ने यह भी संकेत दिए हैं कि भविष्य में मानसून के दौरान मिलने वाले अतिरिक्त पानी के बेहतर उपयोग पर भी काम किया जाएगा। इसके लिए डीपीआर तैयार की जा रही है। अगर अतिरिक्त पानी का वैज्ञानिक तरीके से भंडारण किया जाता है, तो आने वाले वर्षों में पश्चिमी राजस्थान के जल संकट वाले इलाकों को बड़ी राहत मिल सकती है।
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