कुंदन कुमार/पटना। बिहार की शिक्षा व्यवस्था को लेकर राज्य की सियासत एक बार फिर गरमा गई है। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के मुख्य प्रवक्ता एजाज अहमद ने राज्य सरकार की नीतियों और सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था और कार्यप्रणाली के रहते बिहार के सरकारी विद्यालयों में शिक्षा के स्तर में सुधार की उम्मीद करना व्यर्थ है, चाहे सरकार लाख दावे कर ले।

​शिक्षकों के साथ ‘छलावा’ और तबादला नीति का संकट

​एजाज अहमद ने सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि सरकार का ध्यान केवल कागजी खानापूर्ति पर है। उन्होंने शिक्षकों की पीड़ा को बयां करते हुए कहा कि सरकार शिक्षकों के साथ बेहद असंवेदनशील व्यवहार कर रही है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि लंबे समय से शिक्षकों के तबादले (ट्रांसफर-पोस्टिंग) को लेकर जो कवायद चल रही थी, उसका कोई ठोस फॉर्मेट अभी तक तैयार नहीं हो पाया है। बिना किसी स्पष्ट नीति के शिक्षकों को मानसिक प्रताड़ना दी जा रही है।

​’आई वॉश’ की राजनीति और गाइडलाइन की विफलता

​राजद प्रवक्ता ने सरकार की कार्यशैली को ‘आई वॉश’ (आंखों में धूल झोंकने वाला) करार दिया। उन्होंने कहा कि शिक्षा विभाग आए दिन नए-नए नियम और गाइडलाइंस तो जारी करता है, लेकिन उन पर धरातल पर कभी अमल नहीं होता। अक्सर ये आदेश केवल आदेश बनकर ही फाइलों में दफन हो जाते हैं। शिक्षकों को अनुशासन और पठन-पाठन के नाम पर डराया तो जाता है, लेकिन उन्हें संसाधन और उचित वातावरण देने के मामले में सरकार पूरी तरह विफल रही है।

​सुधार की राह में प्रशासनिक अड़चनें

​एजाज अहमद के अनुसार, जब तक सरकार अपनी मंशा साफ नहीं करेगी और शिक्षकों को विश्वास में नहीं लेगी, तब तक शिक्षा में गुणात्मक सुधार संभव नहीं है। सरकारी स्कूलों की बदहाली का मुख्य कारण नीतियों का अभाव और प्रशासनिक सुस्ती है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने जल्द ही तबादला नीति और शिक्षकों की मांगों पर सकारात्मक रुख नहीं अपनाया, तो शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगी। राजद का आरोप है कि सरकार केवल विज्ञापनों और दावों के सहारे सिस्टम को चलाना चाह रही है, जबकि जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है।