चंडीगढ़: पंजाब के कैबिनेट मंत्री संजीव अरोड़ा द्वारा प्रवर्तन निदेशालय की गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका पर गुरुवार को पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में जोरदार बहस हुई। अरोड़ा ने अपनी गिरफ्तारी को ‘असंवैधानिक’ और ‘कानून के विरुद्ध’ बताते हुए इसे रद्द करने की मांग की है।

बचाव पक्ष के वकील ने अदालत में तर्क दिया कि ED के अधिकारी 9 मई की सुबह 7 बजे ही मंत्री के सरकारी आवास पर पहुँच गए थे और उन्हें बाहर जाने की अनुमति नहीं दी गई थी। हालांकि, कागजों में गिरफ्तारी का आधिकारिक समय शाम 4 बजे दिखाया गया है। वकील ने इसे “कानूनी कल्पना” करार देते हुए कहा कि जब किसी व्यक्ति की आजादी पर पाबंदी लगा दी जाती है, वही उसकी वास्तविक गिरफ्तारी का समय माना जाना चाहिए।

35 मिनट में 17 पन्ने तैयार करने पर उठाए सवाल


सुनवाई के दौरान सबसे अधिक बहस गिरफ्तारी के आधार के रूप में पेश किए गए 17 पन्नों के दस्तावेज पर हुई। बचाव पक्ष ने दलील दी कि दोपहर 3:25 बजे बयान दर्ज करने के बाद महज 35 मिनट के भीतर चार्ट सहित 17 पन्नों का विस्तृत दस्तावेज तैयार करना व्यावहारिक रूप से असंभव है। वकील ने तंज कसते हुए कहा कि देश का सबसे तेज़ स्टेनोग्राफर भी इतने कम समय में इतना काम नहीं कर सकता। यह साफ दर्शाता है कि गिरफ्तारी पहले से ही तय थी।

कानूनी प्रक्रिया के उल्लंघन का आरोप

याचिकाकर्ता की ओर से पंकज बंसल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया गया। वकील ने कहा कि गिरफ्तारी के समय अरोड़ा को उचित कानूनी सुरक्षा प्रदान नहीं की गई। ED ने धारा 50(2) के तहत आवश्यक नोटिस जारी नहीं किया। जिन आधारों (GST रिफंड और आयात-निर्यात लेनदेन) पर गिरफ्तारी हुई, उनसे जुड़े महत्वपूर्ण कस्टम रिकॉर्ड और भुगतान दस्तावेजों की जांच नहीं की गई।

मामले की अगली सुनवाई शुक्रवार को

बचाव पक्ष ने अदालत से मांग की कि यदि गिरफ्तारी के आधार सही तरीके से नहीं बताए गए हैं, तो आरोपी को तुरंत रिहा किया जाना चाहिए। हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मामले की सुनवाई शुक्रवार तक के लिए स्थगित कर दी है।