अतीश दीपंकर, भागलपुर। क्षतिग्रस्त विक्रमशिला सेतु को लेकर एक सकारात्मक खबर सामने आई है। दरअसल आज सोमवार को बिहार सरकार के पथ निर्माण विभाग के सचिव पंकज कुमार पाल ने जिलाधिकारी डॉ. नवल किशोर चौधरी के साथ पुल के क्षतिग्रस्त स्लैब पर बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन (BRO) द्वारा कराए जा रहे बेली ब्रिज निर्माण कार्य का निरीक्षण किया।
5 जून से आ-जा सकेंगी छोटी गाड़ियां
निरीक्षण के दौरान पंकज कुमार पाल ने निर्माण कार्य की प्रगति, गुणवत्ता एवं निर्धारित समयसीमा के भीतर कार्य पूर्ण करने को लेकर आवश्यक दिशा-निर्देश दिए गए। डीएम नवल किशोर चौधरी ने कहा कि, 5 जून से छोटी गाड़ियों का आवागमन पुल पर से शुरू हो जाएगा। इस अवसर पर विभागीय अधिकारियों एवं अभियंता गण मौजूद थें।
3 मई की रात गिरा था पुल का स्लैब
गौरतलब है कि बीते 3 मई की रात 12:30 बजे आसपास भागलपुर से उत्तर बिहार को जोड़ने वाला महत्वपूर्ण विक्रमशिला सेतु क्षतिग्रस्त हो गया, जिससे आवागमन पूरी तरह बाधित हो गया है। विक्रमशिला पुल के पाया नंबर 133 का एक स्लैब टूटकर गंगा नदी में गिर गया। हालांकि गनीमत की बात यह रही कि इस घटना में किसी प्रकार के जान-माल की कोई क्षति नहीं पहुंची।
मिली जानकारी के अनुसार पहले विक्रमशिला पुल के पाया नंबर 133 पोल के पास धंसाव हुआ, जिसकी जानकारी मिलने के तुरंत बाद गाड़ियों के आवागमन को बंद कर दिया गया था। इसके कुछ देर बाद ही पुल का वह हिस्सा (133-134 के बीच का) स्लैब टूटकर नदी में गिर गया।
तीन महीने में पुल के रिकवर होने की बात
विक्रमशिला सेतु के क्षतिग्रस्त होने पर बिहार राज्य पुल निगम के अध्यक्ष चंद्रशेखर सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए बताया था कि, साल 2001 में विक्रमशिला पुल को तैयार किया गया था, जो यूपी पुल निगम के द्वारा बनाया गया था। इस मामले में वहां के कार्यपालक अभियंता को निलंबित किया गया है।
उन्होंने कहा था कि, फिलहाल आवागमन के लिए नाव और स्टीमर की व्यवस्था की जा रही है। चार लाइन का पुल निर्माण किया जा रहा है। वो बनने पर सभी समस्याओं का समाधान हो जाएगा। इसके साथ ही उन्होंने तीन महीने के अंदर विक्रमशिला पुल को रिकवर कराने बात कही थी।
हादसे का बना रहता है डर
स्थानीय लोगों का कहना है कि, विक्रमशिला सेतु के टूटने से सबसे ज्यादा परेशानी रोजमर्रा के यात्रियों के साथ-साथ शादी समारोह में शामिल होने वाले परिवारों को हो रही है। बावजूद इसके लोग हर मुश्किल को पार कर अपने रिश्तों और परंपराओं को निभाने में जुटे हुए हैं। लोगों का कहना है कि कई बार नावों पर क्षमता से अधिक भीड़ होने के कारण हादसे का डर भी बना रहता है, लेकिन मजबूरी में लोग यह खतरा मोल ले रहे हैं।
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