अजयारविंद नामदेव, शहडोल। आदिवासी बाहुल्य शहडोल जिले का टीबी अस्पताल इन दिनों खुद ही वेंटिलेटर पर नजर आ रहा है। मरीजों को इलाज देने वाला यह अस्पताल अब अपनी बदहाली की कहानी खुद बयां कर रहा है। यहां चारों ओर फैली गंदगी, जर्जर होती बिल्डिंग, दीवारों में उग आए पेड़ और उनकी फैलती जड़ें इस किसी हॉरर मूवी की डरावनी इमारत जैसा बना चुकी है। हालत इतनी खराब है कि दूर-दराज से इलाज कराने आने वाले मरीजों को अस्पताल में अक्सर ताला लटका मिलता है। डॉक्टर समय पर नहीं पहुंचते, जिससे मरीज बिना इलाज और दवा के मायूस होकर वापस लौटने को मजबूर हैं।
अस्पताल परिसर के आसपास गंदगी और कचरे का अंबार लगा हुआ है, जिससे संक्रमण फैलने का खतरा बना रहता है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि अस्पताल में डॉक्टर समय पर उपलब्ध नहीं रहते। जिसके कारण दूर-दराज से इलाज के लिए आने वाले मरीज मायूस होकर वापस लौटने को मजबूर हैं।
दरअसल, ब्यौहारी क्षेत्र के कल्लेव गांव से लगभग 110 किलोमीटर का लंबा सफर तय कर कलावती पटेल अपने पुत्र के साथ पति कुलदीप पटेल की टीबी की दवा लेने और डॉक्टर से सलाह लेने अस्पताल पहुंची लेकिन अस्पताल में ताला लटका मिला। डॉक्टर के नहीं मिलने पर उन्हें बिना इलाज लौटना पड़ा। इसी तरह जिला मुख्यालय से लगे कल्याणपुर की अहिल्या सिंह, जो जीएनएम नर्सिंग की छात्रा हैं, टीबी जांच रिपोर्ट लेने अस्पताल आई थीं, लेकिन अस्पताल बंद होने से उन्हें भी निराश लौटना पड़ा।
वहीं जयसिंहनगर के रमतोरा गांव से लगभग 80 किलोमीटर दूर से शिव नारायण सिंह टीबी जांच के लिए सैंपल लेकर पहुंचे थे, लेकिन अस्पताल में ताला और डॉक्टर की अनुपस्थिति देखकर वे भी वापस लौट गए। मरीजों का कहना है कि अस्पताल में अक्सर यही स्थिति बनी रहती है, जिससे गरीब और ग्रामीण मरीजों को भारी परेशानी झेलनी पड़ रही है।
टीबी जैसी गंभीर बीमारी के इलाज के लिए बनाए गए इस अस्पताल की बदहाल तस्वीर स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर रही है। इस पूरे मामले में शहडोल CMHO डॉ राजेश मिश्रा का कहना है कि टीबी अस्पताल समय पर खुला रहता है। अस्पताल में टीबी की जांच भी पूरी तरह से की जा रही। टीबी अस्पताल का भवन काफी पुराना है, जिसके लिए नए भवन का प्रस्ताव चल रहा है।

