अजयारविंद नामदेव, शहडोल। आदिवासी बाहुल्य शहडोल जिले के जैतपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की हकीकत सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल रही है। करोड़ों रुपये की लागत से बनी चमचमाती अस्पताल बिल्डिंग तो खड़ी है, लेकिन यहां मरीजों के इलाज के लिए डॉक्टर नदारद हैं। हालात ऐसे हैं कि खासकर रविवार को बीमार पड़ना किसी मुसीबत से कम नहीं, क्योंकि अस्पताल में मरीजों का इलाज डॉक्टर नहीं बल्कि वार्ड बॉय और आउटसोर्स कर्मचारी करते नजर आते हैं।

एंबुलेस मौजूद फिर भी नहीं मिला लाभ

लल्लूराम डॉट कॉम (Lalluram.com) की ग्राउंड जीरो रिपोर्ट में सामने आया कि अस्पताल में दो-दो 108 एंबुलेंस खड़ी होने के बावजूद मरीजों को उनका लाभ नहीं मिल पा रहा। इसके पीछे की वजह एंबुलेंस में डीजल नहीं होना था। ताजा मामला गाड़ाघाट लांघा निवासी आनंद यादव का है, जहां सड़क हादसे में घायल लोगों को इलाज के लिए जैतपुर अस्पताल लाया गया। लेकिन डॉक्टर नहीं मिलने पर जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया। 

प्राइवेट गाड़ी से ले गए परिजन

परिजन एंबुलेंस की उम्मीद लगाए बैठे रहे, मगर डीजल नहीं होने का हवाला देकर वाहन उपलब्ध नहीं कराया गया। आखिरकार घायल को प्राइवेट वाहन से जिला मुख्यालय ले जाना पड़ा। 

रोजाना 60 मरीजों की होती है ओपीडी

हैरानी की बात यह है कि इस अस्पताल में रोजाना करीब 60 मरीजों की ओपीडी होती है। रिकॉर्ड में डॉ. अभिषेक मिश्रा, डॉ. राधेश्याम समेत तीन डॉक्टरों की ड्यूटी लगाई जाती है, लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप है कि डॉक्टर अस्पताल पहुंचते ही नहीं। ऐसे में इलाज की जिम्मेदारी वार्ड बॉय और आउटसोर्स कर्मचारियों पर आ जाती है।

अस्पताल में आउटसोर्स और स्थायी कर्मचारियों की लंबी फौज मौजूद है, लेकिन डॉक्टरों की गैरमौजूदगी ने पूरी व्यवस्था को भगवान भरोसे छोड़ दिया है। सवाल यह है कि करोड़ों की इमारत और सरकारी संसाधनों के बावजूद आखिर मरीजों को इलाज के लिए दर-दर क्यों भटकना पड़ रहा है?

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