Dharm Desk – आज 25 अप्रैल को पूरे देश में सीता नवमी यानी जानकी जयंती श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जा रही. राम नवमी के ठीक एक महीने बाद बैसाख मास के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व माता सीता के प्राकट्य दिवस के रूप में विशेष महत्व रखता हैं. धार्मिक मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से माता सीता और भगवान श्रीराम की पूजा करने से सुख, समृद्धि और वैवाहिक जीवन में खुशहाली आती है. आज अभिजीत मुहूर्त दोपहर 11:53 बजे से 12:46 बजे तक रहेगा.

माता सीता का जन्मस्थान
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, बिहार के सीतामढ़ी जिले के पुनौरा गांव को माता सीता का जन्मस्थान माना जाता है. मान्यता है कि राजा जनक जब खेत में हल चला रहे थे. उसी दौरान भूमि से एक कलश के माध्यम से माता सीता का प्राकट्य हुआ. यही कारण है कि इस जगह पर माता सीता का मंदिर भी बना हुआ है, जहां दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं. बताया जाता है कि राजा जनक की राजधानी जनकपुर थी, जो वर्तमान में नेपाल में स्थित है. वहीं माता सीता का पालन-पोषण हुआ.
14 वर्षों तक माता सीता ने एक ही साड़ी धारण की
रामायण के अनुसार, जब भगवान श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास हुआ, तब माता सीता ने राजसी जीवन का त्याग कर उनके साथ वन जाने का निर्णय लिया. इस दौरान उन्होंने एक तपस्वी की तरह जीवन व्यतीत किया. कंद-मूल खाकर, भूमि पर शयन कर और कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने पत्नी धर्म का पालन किया. वनवास के पूरे 14 वर्षों तक माता सीता ने एक ही साड़ी धारण की, जिसके पीछे एक विशेष कथा जुड़ी हुई है.
माता अनुसूइया ने दिया था भेंट
वनवास के दौरान भगवान श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण महर्षि अत्रि के आश्रम पहुंचे थे. यहां माता अनुसूइया ने सीता जी को पुत्री समान स्नेह दिया. उन्हें पतिव्रत धर्म का उपदेश दिया. इसी दौरान उन्होंने सीता जी को एक दिव्य साड़ी और आभूषण भेंट किए, जो उन्हें देवताओं से प्राप्त हुए थे. बताया जाता है कि यह साड़ी कभी मैली नहीं होती थी और न ही फटती थी. वहीं, आभूषणों की चमक भी कभी कम नहीं होती थी. इन दिव्य वस्त्रों का उद्देश्य वनवास के कठिन समय में भी माता सीता की पवित्रता और सौंदर्य को बनाए रखना था. यही वजह है, माता सीता ने अपने पूरे वनवास काल में इसी साड़ी को धारण किया था.
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