चंडीगढ़: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सोनीपत के एक संवेदनशील मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए दो नाबालिग बहनों से दुष्कर्म और उनकी हत्या के आरोप में मौत की सजा पाए चारों युवकों को बरी कर दिया है। इसके साथ ही अदालत ने चारों आरोपियों को तुरंत जेल से रिहा करने के आदेश जारी किए हैं।

न्यायमूर्ति अनूप चितकारा और न्यायमूर्ति रमेश चंदर डिमरी की खंडपीठ ने फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि हालांकि यह एक गंभीर अपराध है, लेकिन अभियोजन पक्ष कानूनी रूप से ऐसा कोई ठोस और विश्वसनीय सबूत पेश नहीं कर सका जो आरोपियों को इस अपराध से सीधे जोड़ता हो। कोर्ट ने ‘संदेह का लाभ’ (Benefit of Doubt) देते हुए चारों की मौत की सजा और अन्य सभी सजाओं को रद्द कर दिया।

मेडिकल रिपोर्ट में दुष्कर्म और जहर की पुष्टि, पर आरोपियों से लिंक गायब

अदालत ने अपने फैसले में माना कि दोनों नाबालिग बहनों के साथ दुष्कर्म हुआ था और उन्हें जहरीला पदार्थ देकर मारा गया था, क्योंकि विसफोट जांच में ‘पेंडिमेथालिन’ नामक खरपतवार नाशक (जहर) पाया गया था। इसके बावजूद, अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा कि यह कृत्य इन्हीं चारों आरोपियों ने किया था।

बरी करने के पीछे कोर्ट के मुख्य तर्क:

मां के बयानों में विरोधाभास: मामले की शुरुआत में मृतका की मां ने डॉक्टरों को बताया था कि बेटियों को आधी रात को सांप ने काट लिया है। बाद में बयानों में बदलाव आया, जिसे अदालत ने विरोधाभासी माना।

डीएनए (DNA) साक्ष्य का न होना: मामले में आरोपियों के खिलाफ कोई भी पुख्ता डीएनए साक्ष्य सामने नहीं आया।

जबरन जहर देने के सबूत नहीं: लड़कियों के होंठ या मुंह पर चोट के कोई निशान नहीं थे, जिससे यह पहली नजर में साबित नहीं होता कि उन्हें जबरन जहर पिलाया गया था।

दबाव में दिए गए बयान अमान्य: कोर्ट ने कहा कि आरोपियों के बयानों के आधार पर जो बरामदगी दिखाई गई, वह कानूनी रूप से मान्य नहीं है क्योंकि वह तथ्य पुलिस जांच में पहले से ही सामने आ चुके थे।

मामले की पृष्ठभूमि:

यह घटना अगस्त 2021 की है, जब सोनीपत के कुंडली थाने में इस मामले की प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। निचली अदालत ने चारों आरोपियों को दोषी मानते हुए फांसी की सजा सुनाई थी, जिसे अब हाईकोर्ट ने पलट दिया है।