कृष्ण कुमार सैनी, चंडीगढ़: पराली जलाने की रोकथाम के लिए केंद्र के प्रस्तावित नए नियमों को लेकर हरियाणा में सियासत गरमा गई है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने ‘रेड एंट्री’ के प्रावधान को लेकर केंद्र सरकार पर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि पराली जलाने की कार्रवाई का असर अब केवल जुर्माने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि किसान की जमीन के राजस्व रिकॉर्ड तक पहुंच जाएगा।

सुरजेवाला ने आरोप लगाया कि सरकार किसानों की समस्या का समाधान तलाशने के बजाय उनके लिए कार्रवाई का दायरा बढ़ा रही है। उन्होंने कहा कि किसान की फसल और खेत से जुड़ी जमीन के रिकॉर्ड में किसी तरह की प्रतिकूल प्रविष्टि होने से उसके लिए आगे आर्थिक गतिविधियों में दिक्कतें पैदा हो सकती हैं।

दरअसल, केंद्र ने फसल अवशेष जलाने से संबंधित 2026 के ड्राफ्ट नियम जारी किए हैं। प्रस्तावित व्यवस्था के मुताबिक, जिस कृषि भूमि पर पराली जलाने की घटना दर्ज होगी, उसके राजस्व रिकॉर्ड में ‘रेड एंट्री’ की जा सकती है। यह प्रविष्टि 15 महीने तक प्रभावी रहने का प्रावधान है। अगर उसी जमीन पर दोबारा पराली जलाने की घटना सामने आती है या लगाया गया पर्यावरणीय मुआवजा जमा नहीं किया जाता, तो अवधि अगले 15 महीने तक बढ़ सकती है। फिलहाल ये नियम ड्राफ्ट चरण में हैं और सरकार ने इस पर आपत्तियां एवं सुझाव मांगे हैं।

यही प्रावधान अब सुरजेवाला के निशाने पर है। उन्होंने सवाल उठाया कि खेती करने वाले किसान को प्रदूषण की समस्या का जिम्मेदार ठहराने के बजाय सरकार उसके सामने पराली प्रबंधन के आसान और सस्ते विकल्प क्यों नहीं उपलब्ध कराती। उनके मुताबिक छोटे और मध्यम किसानों के लिए महंगी मशीनरी खरीदना आसान नहीं है।

कांग्रेस नेता ने विशेष तौर पर हरियाणा के किसानों का मुद्दा उठाते हुए कहा कि पराली प्रबंधन के लिए मशीनें उपलब्ध कराने की व्यवस्था व्यक्तिगत किसान के बजाय सामूहिक या सहकारी स्तर पर की जानी चाहिए। उनका तर्क है कि इससे किसान पर मशीन खरीदने का भारी आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा और पराली के निपटारे का रास्ता भी निकलेगा।
सुरजेवाला ने सरकार की मंशा पर भी सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि किसानों पर लगातार नए प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं। उन्होंने ‘रेड एंट्री’ को लेकर आशंका जताई कि जमीन के रिकॉर्ड पर इसका असर किसान के लिए आगे चलकर आर्थिक परेशानी का कारण बन सकता है।

प्रस्तावित नियमों में पराली जलाने पर पर्यावरणीय मुआवजे का प्रावधान भी रखा गया है। जमीन के आकार के आधार पर यह राशि ₹5,000 से ₹30,000 तक हो सकती है। ड्राफ्ट में यह भी प्रस्तावित है कि इस राशि का इस्तेमाल फसल अवशेष प्रबंधन, फसल विविधीकरण, बायोमास के उपयोग, शोध और पराली प्रबंधन तकनीकों को बढ़ावा देने जैसे कामों में किया जाए।

सुरजेवाला ने सरकार से किसानों को दंडित करने के बजाय पराली प्रबंधन के लिए व्यावहारिक सहायता बढ़ाने की मांग की। उन्होंने कहा कि यदि सरकार वास्तव में पराली जलाने की समस्या कम करना चाहती है तो किसानों को मशीनरी, तकनीक और आर्थिक सहयोग उपलब्ध कराना ज्यादा जरूरी है।

गौरतलब है कि प्रस्तावित नियमों का दायरा दिल्ली-एनसीआर और उससे जुड़े राज्यों के उन क्षेत्रों पर है, जहां फसल अवशेष जलाने को लेकर वायु प्रदूषण नियंत्रण के उपाय लागू किए जाते हैं। CAQM ने 2026 में भी पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में फसल अवशेष जलाने की रोकथाम के लिए राज्य स्तर पर कार्रवाई और समयबद्ध योजनाओं पर जोर दिया है।

*सुरजेवाला ने इसी मुद्दे को किसानों की जमीन और खेती के भविष्य से जोड़ते हुए केंद्र सरकार की नीति पर सवाल उठाए हैं। अब देखना होगा कि ड्राफ्ट नियमों पर मिलने वाली आपत्तियों और सुझावों के बाद अंतिम व्यवस्था में क्या बदलाव किए जाते हैं।

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